
गया जी: मोक्ष स्थली के नाम से प्रसिद्ध गया जी का इतिहास धार्मिक आस्था के साथ-साथ कई ऐतिहासिक घटनाओं से भी जुड़ा है। बताया जाता है कि मुगल शासनकाल में यहां पिंडदान और दर्शन के लिए आने वाले गैर-मुस्लिम तीर्थयात्रियों से जजिया कर वसूला जाता था। इस टैक्स के कारण दूर-दराज से आने वाले पिंडदानियों की संख्या धीरे-धीरे कम होने लगी थी।
जजिया एक धार्मिक कर था, जिसे गैर-मुस्लिमों से वसूला जाता था। इतिहास में इसका इस्तेमाल अलग-अलग मुस्लिम शासकों के दौर में हुआ। मुगल बादशाह अकबर ने 1564 में जजिया कर समाप्त कर दिया था, लेकिन औरंगजेब ने इसे दोबारा लागू किया। गया जी में भी इस कर की वजह से हिंदू तीर्थयात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा।
घटने लगी पिंडदानियों की संख्या:
गया जी में पिंडदान को पितरों की मोक्ष प्राप्ति से जोड़कर देखा जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आते रहे हैं। लेकिन कर के कारण जब तीर्थयात्रियों का आगमन कम होने लगा तो गयापाल पंडा समाज चिंतित हो गया। पंडा समाज के लोग अपने पुराने जजमानों से मिलने उनके क्षेत्रों में पहुंचे। वहां लोगों ने बताया कि वे गया जी आकर पिंडदान करना चाहते हैं, लेकिन अतिरिक्त टैक्स उनके लिए बड़ी बाधा बन गया है।
इसके बाद गयापाल पंडा समाज ने इस समस्या को अपने मुखिया शहर चंद्र चौधरी के सामने रखा। बताया जाता है कि वे दिल्ली दरबार पहुंचे और औरंगजेब के सामने विष्णुपद मंदिर की धार्मिक महत्ता, पिंडदान की परंपरा और पंडा समाज की आजीविका से जुड़ी समस्याओं को रखा।
औरंगजेब के सामने रखी गई समस्या:
स्थानीय परंपरा के अनुसार, गयापाल पंडा समाज की बात सुनने के बाद औरंगजेब ने गया जी में जजिया कर हटाने की घोषणा की। इसके साथ ही पंडा समाज को आलमगीरपुर क्षेत्र की जागीर दिए जाने की बात भी सामने आती है। इसके बाद कई गयापाल पंडा परिवार यहां आकर रहने लगे।
आज भी अंदर गया का यह क्षेत्र अपने चार ऐतिहासिक फाटकों और पुरानी किलेबंदी के लिए जाना जाता है। यह स्थान गयापाल पंडा समाज के इतिहास और गया जी की धार्मिक परंपराओं की याद को संजोए हुए है।





