बिहार के गया जिले में स्थित रामेश्वर बाग महल कभी टिकारी राज की शान माना जाता था। करीब 136 साल पहले बना यह भव्य महल आज उपेक्षा के कारण खंडहर में तब्दील हो चुका है। स्थानीय लोग सरकार से इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण की मांग कर रहे हैं।
गया-टिकारी मार्ग पर पंचानपुर के पास स्थित रामेश्वर बाग महल का निर्माण वर्ष 1890 के आसपास टिकारी राज की सात आने की मालकिन रामेश्वरी कुंवर, जिन्हें दुल्हन साहिबा के नाम से भी जाना जाता था, ने कराया था। महल अपनी अनोखी बनावट के कारण भूल-भुलैया कहलाता था। इसमें करीब 500 कमरे और दरवाजे थे, जिससे कोई भी नया व्यक्ति आसानी से रास्ता भटक जाता था।
स्थानीय लोगों के अनुसार, रामेश्वर बाग महल और टिकारी किला लगभग सात किलोमीटर लंबी सुरंग से जुड़े थे। महल के विशाल बगीचे में आम, अमरूद, आंवला, अनार, केला, इमली और कई दुर्लभ प्रजातियों के पेड़-पौधे लगाए गए थे। यहां के फल और फूल आसपास के गांवों की जरूरतें भी पूरी करते थे।
महल परिसर में राधा-कृष्ण, भगवान शिव समेत कई देवी-देवताओं के नौ मंदिर बनाए गए थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक प्रतिमा की आंखों में हीरे जड़े थे, जिन्हें बाद में असामाजिक तत्व निकाल ले गए। महल की देखरेख करने वाले बहादुर बताते हैं कि ट्रस्ट बनने के बावजूद वर्षों से इस धरोहर की समुचित देखभाल नहीं हो रही है।
“महल, मंदिर और बाग की जमीन ट्रस्ट के नाम है, लेकिन आज इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। धीरे-धीरे यह पूरी तरह जर्जर होता जा रहा है।”
रामेश्वरी कुंवर को न्यायप्रिय और दयालु शासिका माना जाता था। 1942 में उनके निधन के बाद उनकी पुत्री भुवनेश्वरी कुंवर ने राज संभाला। समय के साथ यह शाही महल अपनी पहचान खोता गया और आज संरक्षण के अभाव में इतिहास का साक्षी बनकर खड़ा है।
स्थानीय लोगों की मांग है कि सरकार इस ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण कर इसे पर्यटन स्थल, संग्रहालय, अस्पताल या कॉलेज के रूप में विकसित करे। उनका मानना है कि समय रहते पहल नहीं हुई तो बिहार की यह अमूल्य विरासत हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगी।






