इंटरनेट के दौर में भी जिंदा है कठपुतली की परंपरा, गया के लई गांव के कलाकार बचा रहे भारतीय संस्कृति की विरासत


बिहार के गया जिले के नक्सल प्रभावित मोहनपुर प्रखंड का लई गांव आज भी भारतीय लोक संस्कृति की एक अनमोल धरोहर को संजोए हुए है। जहां इंटरनेट और मोबाइल के दौर में पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, वहीं इस गांव के कुछ कलाकार कठपुतली नृत्य की परंपरा को जीवित रखने में जुटे हैं।
गांव के बनारसी मांझी, शिवव्रत मांझी और अनिल मांझी वर्षों से बिना किसी आर्थिक लाभ के कठपुतली नृत्य का मंचन कर रहे हैं। उनके कार्यक्रम केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शराबबंदी, दहेज प्रथा, बाल श्रम, शिक्षा और सामाजिक कुरीतियों जैसे विषयों पर लोगों को जागरूक करने का माध्यम भी बनते हैं।

कठपुतली नृत्य भारतीय लोक संस्कृति की प्राचीन कला है। कभी गांव-गांव में इसकी धूम रहती थी, लेकिन आधुनिक तकनीक और बदलती जीवनशैली के कारण अब इसके दर्शक लगातार कम होते जा रहे हैं। इसके बावजूद लई गांव के लोग इस परंपरा को बचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
कलाकारों का कहना है कि कठपुतली नृत्य के माध्यम से किसान, मजदूर और आम लोगों के जीवन संघर्ष के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों पर भी प्रभावी संदेश दिया जाता है। उनका मानना है कि यह कला समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की ताकत रखती है।

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बनारसी मांझी बताते हैं कि कई दशक पहले चंडीगढ़ से आई एक महिला ने लई गांव में इस कला की शुरुआत की थी। उस समय लोग टिकट लेकर कठपुतली नृत्य देखने आते थे, लेकिन आज दर्शकों की संख्या काफी घट गई है। फिर भी गांव के कलाकार इस विरासत को बचाने के लिए निःशुल्क प्रदर्शन कर रहे हैं।
कठपुतली कला भारत की प्राचीन लोक परंपराओं में शामिल है। इसमें धागा, छाया, दस्ताना और छड़ कठपुतली जैसी कई शैलियां प्रचलित हैं। गया का लई गांव यह संदेश दे रहा है कि यदि समाज और सरकार का सहयोग मिले, तो यह विलुप्त होती लोक कला फिर से नई पीढ़ी तक पहुंच सकती है और भारतीय संस्कृति की यह अमूल्य विरासत हमेशा जीवंत रह सकती है।

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