पूर्णिया में एक ऐसा प्रयास हो रहा है, जो बिहार की सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने का काम कर रहा है। यहां 500 वर्ष पुरानी ताड़पत्र और बांस पत्र पर लिखी दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जा रहा है।
मानव सभ्यता का इतिहास केवल स्मारकों और मंदिरों में ही नहीं, बल्कि उन पांडुलिपियों में भी जीवित है, जिनमें सदियों पहले ज्ञान, संस्कृति और समाज को शब्दों में संजोया गया था। छपाई तकनीक आने से पहले ताड़पत्र, भोजपत्र और बांस पत्र पर धार्मिक ग्रंथ, वंशावली, साहित्य और ऐतिहासिक अभिलेख लिखे जाते थे। आज यही पांडुलिपियां इतिहास और संस्कृति को समझने का महत्वपूर्ण आधार हैं।
पूर्णिया के विद्वान पंडित विद्यानंद झा पिछले कई वर्षों से लगभग 500 वर्ष पुराने ताड़पत्रों और बांस पत्रों पर लिखी मिथिला की दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण कर रहे हैं। लाल, पीले और सफेद कपड़ों में सहेजकर रखी गई इन पांडुलिपियों में मिथिला की वंशावली, सामाजिक परंपराएं और सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित हैं
“हम इन पांडुलिपियों को केवल सुरक्षित ही नहीं रख रहे, बल्कि आधुनिक तकनीक से इनका डिजिटलीकरण भी कर रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अमूल्य विरासत तक पहुंच सकें।”
नमी, धूल और समय के प्रभाव से ताड़पत्र तेजी से क्षतिग्रस्त होते हैं। ऐसे में विद्यानंद झा विशेष सावधानी के साथ सफाई, संरक्षण और स्कैनिंग का कार्य कर रहे हैं। उनके इस प्रयास की सराहना जिला प्रशासन ने भी की है और उन्हें सम्मानित किया गया है।
“अगर सरकार तकनीकी और वित्तीय सहयोग दे, तो इन दुर्लभ पांडुलिपियों का वैज्ञानिक संरक्षण और व्यापक डिजिटलीकरण संभव हो सकेगा।”
डिजिटल युग में जब प्राचीन धरोहरें तेजी से विलुप्त हो रही हैं, तब पूर्णिया के विद्यानंद झा अतीत और भविष्य के बीच एक मजबूत सेतु बनकर बिहार की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।





