पटना : बिहार की राजधानी पटना के बापू सभागार में आयोजित ‘एन इवनिंग विद सद्गुरु’ कार्यक्रम में आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव सद्गुरु ने आत्मनियंत्रण, वर्तमान में जीने और मानवता के विकास का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि दूसरों को अपने अनुसार चलाना नहीं, बल्कि स्वयं पर नियंत्रण स्थापित करना है।
अपने संबोधन की शुरुआत में सद्गुरु ने पाटलिपुत्र की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को नमन करते हुए राजा जनक, गार्गी, आर्यभट्ट, महावीर, गौतम बुद्ध और गुरु गोविंद सिंह का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि बिहार ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना की भूमि रही है।
सद्गुरु ने अपने जीवन का अनुभव साझा करते हुए बताया कि 25 वर्ष की उम्र में मैसूर की चामुंडी हिल्स पर उन्हें एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव हुआ, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उसी के बाद उन्होंने आत्मचिंतन और आध्यात्मिक यात्रा का मार्ग चुना।
उन्होंने कहा कि जीवन में हर इच्छा पूरी नहीं हो सकती, इसलिए यह अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए कि हर व्यक्ति हमारे अनुसार चले। यदि 51 प्रतिशत परिस्थितियां भी आपके पक्ष में हैं तो खुद को भाग्यशाली मानिए। सबसे जरूरी है कि व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार पर नियंत्रण रखे।
मानव और चिंपैंजी के डीएनए में केवल 1.3 प्रतिशत अंतर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसकी चेतना और कल्पनाशक्ति है। यदि वह अपने विवेक का विकास नहीं करेगा तो उसका जीवन केवल प्रवृत्तियों तक सीमित रह जाएगा।
आत्मसंयम का महत्व समझाने के लिए सद्गुरु ने ‘मंकी एकादशी’ की कहानी सुनाई। उन्होंने कहा कि बिना आत्मनियंत्रण के कोई भी संकल्प लंबे समय तक टिक नहीं सकता। उन्होंने लोगों से अतीत से सीखने, भविष्य की योजना बनाने और वर्तमान में पूरी जागरूकता के साथ जीने की अपील की।
कार्यक्रम के अंत में बिहार से जुड़े एक सवाल पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि यदि हम नालंदा के गौरव की बात करते हैं तो बख्तियारपुर का नाम बदलने पर भी विचार होना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि केवल अतीत पर गर्व करने से नहीं, बल्कि स्वयं में सकारात्मक बदलाव लाने से ही समाज आगे बढ़ेगा।





