गया के इमामगंज क्षेत्र के सिलदाहा गांव निवासी रफीक उर रहमान खान की सफलता आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। उज़्बेकिस्तान सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने उन्हें शिक्षक के पद पर नियुक्त किया है, जहां वे पिछले आठ महीनों से छात्रों को अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दे रहे हैं। इसके साथ ही वे वहां के सरकारी शिक्षकों की मास्टर क्लास भी लेते हैं।
रफीक का यह सफर बेहद संघर्षों से भरा रहा। उनका बचपन नक्सल प्रभावित इलाके में बीता, जहां हर दिन भय और असुरक्षा का माहौल रहता था। साल 2000 में नक्सलियों ने उनके नाना राजा खान की हत्या कर दी थी और उनके पिता शफीक उर रहमान खान को भी प्रताड़ित किया था। इस घटना के बाद परिवार ने बच्चों को गांव से दूर रखकर शिक्षा दिलाने का फैसला किया।
आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर थी। रफीक बताते हैं कि पहली ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी खरीदने के लिए उनके पिता को पांच महीने तक पैसे बचाने पड़े थे। पढ़ाई के दौरान पिता मजदूरी कर हर महीने मात्र 200 रुपये भेजते थे, जिससे फीस और खाने-पीने का खर्च चलता था। कई बार भूखे रहकर भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।
प्रारंभिक शिक्षा गांव से दूर जाकर प्राप्त करने के बाद उन्होंने गया में इंटर और ग्रेजुएशन किया तथा आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली पहुंचे। वहां पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए कोचिंग में पढ़ाना शुरू किया। लगभग 20 वर्षों के शिक्षण अनुभव और अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
आज ब्रिटिश काउंसिल और नाटो समर्थित शिक्षा कार्यक्रम के तहत वे उज़्बेकिस्तान में कार्यरत हैं। रफीक का मानना है कि युवाओं को केवल डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भाषा, कौशल और नए कोर्सों पर भी ध्यान देना चाहिए। उनका कहना है कि किसी एक विषय में महारत हासिल कर युवा दुनिया के किसी भी देश में बेहतर अवसर प्राप्त कर सकते हैं।
रफीक की सफलता इस बात का प्रमाण है कि कठिन परिस्थितियां और गरीबी भी उस व्यक्ति को नहीं रोक सकतीं, जिसके पास मेहनत, लगन और शिक्षा के प्रति समर्पण हो।







