आज के डिजिटल दौर में 9 से 17 साल के बच्चों की जिंदगी तेजी से स्क्रीन के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का आकर्षण इतना बढ़ गया है कि यह अब आदत से बढ़कर लत का रूप ले चुका है। एक ताजा सर्वे के मुताबिक, भारत में 49 प्रतिशत स्कूली बच्चे रोजाना 3 घंटे या उससे अधिक समय ऑनलाइन गेमिंग में बिताते हैं। वहीं वैश्विक स्तर पर 8 से 18 वर्ष के लगभग 60% लड़के और 24% लड़कियां ऑनलाइन गेम्स को अत्यधिक पसंद करते हैं।

इस बढ़ते स्क्रीन टाइम का सीधा असर बच्चों की सेहत पर पड़ रहा है। वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (Annual Health Survey) की हालिया रिपोर्ट ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, स्क्रीन टाइम में बढ़ोतरी और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण करीब 66% स्कूली बच्चों का फिटनेस स्तर कमजोर पाया गया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि केवल 34% बच्चे ही एरोबिक फिटनेस के तय मानकों पर खरे उतर पाए।

विशेषज्ञों के मुताबिक, एरोबिक फिटनेस का सीधा संबंध दिल और फेफड़ों की क्षमता से होता है। लेकिन रिपोर्ट में यह सामने आया है कि बच्चों की एरोबिक क्षमता तेजी से गिर रही है। इसका मतलब है कि उनके दिल और फेफड़े कमजोर हो रहे हैं और वे लंबे समय तक शारीरिक गतिविधि करने में सक्षम नहीं हैं।

इस गिरती फिटनेस के पीछे सबसे बड़ा कारण मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली को माना गया है। घंटों मोबाइल या स्क्रीन के सामने बैठना, बाहर खेलने की आदत का कम होना और फिजिकल एक्टिविटी की कमी बच्चों को बीमारियों की ओर धकेल रही है।

अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में बच्चों में हृदय संबंधी बीमारियों और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा और बढ़ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया से संतुलित दूरी बनाकर खेल-कूद और शारीरिक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया जाए, ताकि उनका बचपन स्वस्थ और सक्रिय बन सके।

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