नई दिल्ली: संसद में गुरुवार को महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला विधेयक पेश होने जा रहा है, लेकिन इसके साथ जुड़े परिसीमन प्रस्ताव ने सियासी विवाद खड़ा कर दिया है। सरकार लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने और 2011 की जनगणना के आधार पर नए सिरे से सीटों के निर्धारण की तैयारी में है।

विवाद की जड़ उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन को लेकर है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण बेहतर ढंग से लागू किया, जबकि उत्तर भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ी। ऐसे में यदि नई जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो उत्तर भारत के राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी और दक्षिण भारत का राजनीतिक प्रभाव घट सकता है।

फिलहाल 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का निर्धारण 2026 तक स्थिर रखा गया है। सरकार अब इस रोक को हटाकर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है। परिसीमन का मतलब चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण होता है, जो एक स्वतंत्र आयोग द्वारा किया जाता है और इसके फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

विपक्षी दल महिला आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन परिसीमन को इससे जोड़ने का विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार राजनीतिक लाभ के लिए यह कदम उठा रही है। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इसे संविधान और सामाजिक न्याय के खिलाफ बताया है, जबकि पी चिदंबरम और शशि थरूर ने इसे दक्षिणी राज्यों के हितों के विरुद्ध बताया।

दक्षिण भारत के मुख्यमंत्रियों—एमके स्टालिन, रेवंत रेड्डी और पिनराई विजयन—ने भी चिंता जताई है कि यह प्रक्रिया संघीय ढांचे को कमजोर कर सकती है। वहीं, कपिल सिब्बल और योगेंद्र यादव जैसे नेताओं का कहना है कि महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ना गलत है।

कुल मिलाकर, महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे के साथ परिसीमन को जोड़ने से राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अब नजर संसद की चर्चा और संभावित सहमति पर टिकी है।

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