मोक्ष की नगरी  गाय इन दिनों गंभीर समस्या से जूझ रही है। फल्गु नदी और विष्णुपद मंदिर के आसपास पिंडदान करने आने वाले श्रद्धालुओं को पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता सीता के श्राप के कारण फल्गु नदी ‘अंत:सलिला’ हो गई, यानी ऊपर से सूखी दिखती है और अंदर ही अंदर जल बहता है। पहले श्रद्धालु नदी में गड्ढा खोदकर पानी निकाल लेते थे, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। नदी के तल में जमी मोटी गाद और मिट्टी की परत के कारण यह भी संभव नहीं रहा।

सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए 334 करोड़ रुपये की लागत से रबर डैम का निर्माण कराया था, जिसका उद्देश्य सालभर जल उपलब्ध कराना था। लेकिन यह परियोजना फिलहाल उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही। डैम में जमा पानी कुछ ही महीनों में फूल-पत्तियों और पूजा सामग्री के कारण गंदा और बदबूदार हो जाता है, जिससे उसका उपयोग धार्मिक कार्यों में करना संभव नहीं रहता।

स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि प्रशासन को समय-समय पर डैम का पानी छोड़ना पड़ता है। हाल ही में भी पानी डाउनस्ट्रीम छोड़ा गया, जिसके बाद डैम और नदी दोनों लगभग सूख गए हैं।

श्रद्धालु अब पिंडदान के लिए पानी खरीदने को मजबूर हैं या चापाकल पर निर्भर हैं, जहां कई बार पानी निकलना भी मुश्किल हो जाता है। बाहर से आने वाले तीर्थयात्रियों का कहना है कि जिस स्थान पर पहले सहज रूप से पानी मिल जाता था, वहां अब भारी संकट है।

पंडाओं के अनुसार, अगर जल का निरंतर प्रवाह रहता तो पानी दूषित नहीं होता। वर्तमान में जो पानी बचता भी है, वह नाले जैसा प्रतीत होता है और स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा है।

करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सुविधा का अभाव न केवल श्रद्धालुओं के लिए परेशानी बढ़ा रहा है, बल्कि गयाजी की धार्मिक छवि को भी नुकसान पहुंचा रहा है। फिलहाल उम्मीद यही है कि मानसून के आसपास सफाई कार्य शुरू हो सकेगा और हालात में कुछ सुधार आएगा।

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