हाल के वर्षों में देश में बीमारियों का ग्राफ बढ़ा जरूर है, लेकिन इसका एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि अब लोग पहले के मुकाबले ज्यादा सतर्क होकर समय पर इलाज करा रहे हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की ‘घरेलू सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य’ (2025) रिपोर्ट के अनुसार, अब 13.1% लोग अस्पताल तक पहुंच रहे हैं, जबकि 2017-18 में यह आंकड़ा केवल 7.5% था।
रिपोर्ट बताती है कि अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन प्रति मरीज 34,064 रुपये खर्च होते हैं। हालांकि सरकारी और निजी अस्पतालों के खर्च में भारी अंतर है। सरकारी अस्पताल में औसत खर्च 6,631 रुपये है, जबकि निजी अस्पतालों में यह बढ़कर 50,508 रुपये तक पहुंच जाता है। दवाओं, जांच, डॉक्टर फीस और रूम चार्ज निजी अस्पतालों को महंगा बनाते हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे गरीब राज्यों में सरकारी अस्पतालों का खर्च राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। बिहार में यह औसत 10,553 रुपये तक पहुंच जाता है। वहीं दक्षिण भारत में सरकारी इलाज सस्ता है, लेकिन निजी अस्पताल सबसे महंगे हैं—तमिलनाडु और तेलंगाना इसमें शीर्ष पर हैं।
बीमारियों के स्वरूप में भी बदलाव आया है। अब संक्रामक रोगों की तुलना में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग प्रमुख समस्या बन गए हैं। बुजुर्गों में बीमारी की दर 43.9% तक पहुंच गई है, जबकि बच्चों में संक्रमण और श्वसन संबंधी बीमारियां आम हैं।
रिपोर्ट का एक सकारात्मक पहलू यह है कि अब 96% प्रसव अस्पतालों में हो रहे हैं, जिससे मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी आई है।
स्वास्थ्य बीमा को लेकर भी जागरूकता बढ़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में कवरेज 14% से बढ़कर 47% और शहरी क्षेत्रों में 19% से बढ़कर 44% हो गया है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है।
कुल मिलाकर, देश में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहतर हुई है, लेकिन इलाज का बढ़ता खर्च अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
