भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता ने 15 अप्रैल को बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. फिलहाल उनकी सरकार में सिर्फ तीन मंत्री हैं—खुद मुख्यमंत्री और जेडीयू कोटे से दो उपमुख्यमंत्री और ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंत्रिमंडल का विस्तार कब होगा।
सूत्रों और राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, कैबिनेट विस्तार में देरी की मुख्य वजह पश्चिम बंगाल चुनाव को माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि 4 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद ही बिहार में मंत्रिमंडल विस्तार होगा। बीजेपी नेतृत्व फिलहाल चुनावी व्यस्तता में है, इसलिए बिहार पर फैसला टल गया है।
राज्य में कुल 47 विभाग हैं, जिनका बंटवारा अभी तीन नेताओं के बीच कर दिया गया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 29 विभाग अपने पास रखे हैं, जबकि विजय चौधरी को 10 और बिजेंद्र यादव को 8 विभाग मिले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने कम मंत्रियों के साथ सरकार का सुचारू संचालन मुश्किल हो सकता है और विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
एनडीए के सहयोगी दल—लोजपा (रामविलास), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा—को फिलहाल सरकार में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। हालांकि उम्मीद जताई जा रही है कि विस्तार के दौरान इन दलों को भी जगह दी जाएगी। पिछली सरकार की तरह लोजपा को दो और बाकी दलों को एक-एक मंत्री पद मिलने की संभावना है।
वहीं, मंत्री पद के दावेदारों की सक्रियता भी बढ़ गई है। बीजेपी और जेडीयू के कई नेता लगातार शीर्ष नेतृत्व से संपर्क साध रहे हैं। इस बीच की भूमिका को लेकर भी चर्चा जारी है, क्योंकि अंतिम फैसले में उनका प्रभाव अहम माना जा रहा है।
बिहार विधानसभा में 243 सदस्य हैं, जिसके आधार पर अधिकतम 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं। फिलहाल 3 मंत्री होने के कारण 33 पद अभी खाली हैं। माना जा रहा है कि बीजेपी को सबसे ज्यादा और जेडीयू को दूसरे नंबर पर मंत्री पद मिलेंगे।
कुल मिलाकर, बिहार में नई सरकार का विस्तार अब चुनाव परिणाम के बाद ही संभव दिख रहा है, और तब तक सभी की नजरें 4 मई पर टिकी हैं।
