गया जिले के नक्सल प्रभावित रहे तरवापहरी गांव में एक युवा के संकल्प ने बदलाव की नई कहानी लिखनी शुरू कर दी है। यहां के रहने वाले धर्मेंद्र कुमार ने उस इलाके में शिक्षा का दीप जलाने का बीड़ा उठाया, जहां आजादी के दशकों बाद भी कोई स्कूल नहीं था। करीब 700 की आबादी वाले इस गांव के बच्चों को पढ़ने के लिए 3 से 4 किलोमीटर दूर जंगल पार करना पड़ता था, जिससे अधिकांश बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते थे।
धर्मेंद्र कुमार पहले आईएएस की तैयारी कर रहे थे, लेकिन अपने इलाके की बदहाल शिक्षा व्यवस्था ने उनका रास्ता बदल दिया। उन्होंने ठान लिया कि जब तक गांव में स्कूल नहीं बनवा लेते, तब तक बाल और दाढ़ी नहीं कटवाएंगे। पिछले तीन साल से वे अपने इस संकल्प पर अडिग हैं। शुरुआत में लोगों ने उन्हें पागल तक कहा, लेकिन उनका जुनून कम नहीं हुआ।
सरकारी मदद नहीं मिलने के बावजूद धर्मेंद्र ने हार नहीं मानी। उन्होंने भारत भ्रमण तक किया, लेकिन वहां भी सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने खुद ही गांव में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। कभी पेड़ के नीचे तो कभी किसी जर्जर भवन में वे रोजाना करीब 100 बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने लगे।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। गुजरात की एक ट्रस्ट ने उनके प्रयास को समझा और गांव में दो मंजिला स्कूल भवन का निर्माण शुरू कराया। यह स्कूल गुरुकुल पद्धति पर आधारित होगा, जिससे बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सकेगी। गांव के लोगों में अब उम्मीद की नई किरण जगी है।
धर्मेंद्र की मां चंपा देवी भी बताती हैं कि उनका बेटा अपने संकल्प पर हमेशा अडिग रहा, चाहे कितनी भी मुश्किलें आईं। आज जब स्कूल का निर्माण हो रहा है, तो पूरे गांव में खुशी का माहौल है।
धर्मेंद्र की यह पहल सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि ऐसे कई पिछड़े इलाकों के लिए प्रेरणा बन रही है, जहां आज भी शिक्षा एक सपना है।
