बिहार के गयाजी की पवित्र मोक्षभूमि से मानवता, आस्था और सांस्कृतिक एकता की एक अद्भुत तस्वीर सामने आई है। फल्गु नदी के देवघाट पर विश्व के करीब 40 देशों से आए 76 विदेशी श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विधि-विधान के साथ पिंडदान किया। सात समंदर पार से आए इन लोगों की सनातन धर्म में गहरी आस्था ने वहां मौजूद स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों को भावुक कर दिया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गया को मोक्ष की भूमि माना जाता है, जहां पिंडदान करने से पितरों को शांति और मुक्ति मिलती है। इसी विश्वास के साथ अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन और रूस जैसे देशों से आए श्रद्धालुओं ने पारंपरिक वेशभूषा में मंत्रोच्चार के बीच तर्पण और पिंडदान किया। पूरे अनुष्ठान को स्थानीय पंडा छोटू बारिक ने वैदिक रीति-रिवाज से संपन्न कराया।
इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि इन श्रद्धालुओं ने केवल अपने पूर्वजों के लिए ही नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए भी प्रार्थना की। उन्होंने युद्धों में मारे गए निर्दोष लोगों—खासतौर पर रूस-यूक्रेन संघर्ष और अन्य वैश्विक हिंसाओं के पीड़ितों—की आत्मा की शांति के लिए भी पिंडदान किया। यह पहल उनके भीतर मानवता और करुणा के गहरे भाव को दर्शाती है।
विशेष रूप से ध्यान देने वाली बात यह रही कि इस समूह में रूस और यूक्रेन, दोनों देशों के नागरिक शामिल थे। मौजूदा वैश्विक तनाव के बीच, गया की धरती पर उनका एक साथ बैठकर शांति और भाईचारे का संदेश देना “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना को साकार करता है।
कुल मिलाकर, देवघाट पर आयोजित यह पिंडदान कार्यक्रम न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि इसने वैश्विक स्तर पर गया की महत्ता को भी उजागर किया। यह आयोजन यह संदेश देता है कि आध्यात्मिकता की कोई सीमा नहीं होती और शांति, करुणा व एकता ही मानवता का सबसे बड़ा धर्म है।
