देह पर देवता: सावन-भादो में जीवंत होती थी गांवों की अनोखी लोकआस्था, अब यादों में सिमटती परंपरा

सावन-भादो आते ही भोजपुरी अंचल के ग्रामीण इलाकों में कभी आस्था और लोकविश्वास की एक अलग ही दुनिया जीवंत हो उठती थी। गांवों में मान्यता थी कि इस दौरान कुछ लोगों की देह पर देवता आते हैं। कोई धधकती आग पर नंगे पांव चल पड़ता, कोई जलता हुआ खप्पर हाथ में उठा लेता, तो कोई खौलते दूध से स्नान करता था। ग्रामीण समाज के लिए ये दृश्य किसी चमत्कार से कम नहीं होते थे।

 

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इसे अंधविश्वास कहें, लोकआस्था कहें या सदियों पुरानी परंपरा, लेकिन गांव के लोगों के लिए यह विश्वास बेहद गहरा था। बचपन में मैंने भी अपने ग्रामीण परिवेश में ऐसे कई दृश्य देखे हैं। हमारे पंचायत के बगल का पंचायत पदमौल है। वहां का मिडिल स्कूल कभी हमारे ही पंचायत का हिस्सा हुआ करता था। इसी गांव के रहने वाले इंद्रासन भगत के बारे में बचपन में खूब सुना और देखा करता था कि सावन में उनकी देह पर देवता आते हैं।

 

मेला लगने पर दूर-दूर से लोग पहुंचते थे। इंद्रासन भगत करीब तीन फीट ऊंची छलांग लगाते हुए आगे बढ़ते और पीछे श्रद्धालुओं की लंबी कतार चलती। कभी उनके हाथ में जलता हुआ खप्पर होता, कभी डंडे से लोगों को आशीर्वाद देते, तो कभी धधकती आग पर चलते और खौलते दूध से स्नान करते। गर्म खीर को हाथों से चलाने की बात भी लोग श्रद्धा से बताते थे।

 

कहा जाता था कि देवता के पूरी तरह विराजमान होने वाले दिन हजारों लोग उनका आशीर्वाद लेने पहुंचते थे। कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। श्रद्धा से लोग कुछ चढ़ा देते तो वह अलग बात थी। अनुष्ठान से पहले संबंधित व्यक्ति खान-पान में संयम रखते और कई बार फलाहार करते थे।

 

आज मांदर की थाप, लोकगीत, भगतई और ऐसे कई अनुष्ठान गांवों से धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। इन परंपराओं को सही या गलत ठहराने से अधिक जरूरी है कि इन्हें लोक-संस्कृति और लोक-स्मृति के दस्तावेज के रूप में संरक्षित किया जाए।

 

मैंने बचपन में यह सब अपनी आंखों से देखा है। तब समझ नहीं थी कि यह आस्था थी, परंपरा थी या रहस्य। बस इतना जानता था—गांव की उस दुनिया में यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।

 

 

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