पटना: डॉक्टर की पहचान आमतौर पर मरीजों के इलाज और चिकित्सा सेवा से होती है, लेकिन पटना के यूरोलॉजिस्ट डॉ. वरुण सिन्हा की पहचान इससे कहीं आगे है। पिछले करीब 55-56 वर्षों से फोटोग्राफी उनके जीवन का अहम हिस्सा है। कैमरा उनके लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि प्रकृति, वन्यजीवन और दुनिया को करीब से देखने का जरिया रहा है।
डॉ. वरुण ने 1970 के दशक में फोटोग्राफी शुरू की, जब न डिजिटल कैमरे थे और न मोबाइल कैमरे। उस दौर में तस्वीर खींचना तकनीक, धैर्य और इंतजार का काम हुआ करता था। समय के साथ उनका यह जुनून अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। उन्होंने भारत के लगभग सभी प्रमुख जंगलों में वन्यजीवों की तस्वीरें खींची हैं और कई दुर्लभ पलों को कैमरे में कैद किया है।
उनकी उपलब्धियों में अंटार्कटिका की यात्रा भी शामिल है, जहां उन्होंने वन्यजीवन और प्रकृति की तस्वीरें उतारीं। फोटोग्राफी के क्षेत्र में उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2011 में उन्हें FIAP की ओर से MFIAP सम्मान मिला। बताया जाता है कि चीता पर खींची गई 20 अलग-अलग तस्वीरों के लिए उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला। इसके अलावा रॉयल फोटोग्राफिक सोसाइटी, इंग्लैंड से ARPS सम्मान और अमेरिका में GMPSA पुरस्कार भी उन्हें मिला है।
डॉ. वरुण ने 1974 में मेडिकल की डिग्री और 1978 में एमएस की डिग्री हासिल की। 1982 में एडिनबरा से एफआरसीएस करने के बाद उन्होंने इंग्लैंड और सऊदी अरब में चिकित्सक के रूप में काम किया। उन्होंने बिहार सरकार की नौकरी नहीं की और अपनी प्रैक्टिस पर ध्यान केंद्रित किया।
डॉ. वरुण के मुताबिक, शुरुआती दौर की फोटोग्राफी बेहद चुनौतीपूर्ण थी। पिनहोल कैमरे और शुरुआती फोटोग्राफिक तकनीकों से तस्वीर तैयार करने में घंटों लगते थे। उनके लिए डॉक्टर और फोटोग्राफर की दोनों भूमिकाएं जीवन का हिस्सा हैं। मरीजों के इलाज की जिम्मेदारी के साथ कैमरे के जरिए प्रकृति को देखना उन्हें तनाव से दूर करता है।
डॉ. वरुण की कहानी बताती है कि जुनून की कोई उम्र नहीं होती।






