एक गरीब आदिवासी परिवार में जन्मी सविता प्रधान की जिंदगी कभी किसी दर्दनाक फिल्म से कम नहीं थी। महज 16 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई। सपने देखने की उम्र में उन्हें ऐसा ससुराल मिला, जहां हर दिन अपमान, मारपीट और प्रताड़ना उनका इंतजार करती थी।

 

शादी के बाद सविता की जिंदगी नर्क बन गई। घर में उन्हें नौकरानी की तरह रखा जाता था। सफाई, बर्तन, कपड़े धोना—सब कुछ उन्हीं से कराया जाता। खाना तक नसीब नहीं होता था। सविता खुद बताती हैं कि कई बार वे अपनी अंडरगारमेंट्स में रोटी छिपाकर बाथरूम जाती थीं और वहीं चुपके से खाकर पेट भरती थीं।

 

छोटी-छोटी बातों पर मारपीट आम थी। शरीर पर चाकू के निशान, जलने के घाव और माथे की चोटें उनके दर्द की गवाही देती थीं। जब उन्होंने अपने पिता से मदद मांगी, तो उन्होंने आने का वादा किया, लेकिन वे कभी नहीं आए। उस दिन सविता को समझ आ गया कि उन्हें खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी।

 

दो बच्चों की मां बनने के बाद भी अत्याचार नहीं रुका। एक दिन उन्होंने आत्महत्या तक का फैसला कर लिया। बच्चों को सुलाकर, छोटे बेटे को दूध पिलाकर वे फांसी लगाने जा रही थीं, लेकिन उसी पल उनके भीतर जीने की जिद जाग उठी। उन्होंने फंदा उतारा और ससुराल छोड़कर निकल पड़ीं।

 

सिर्फ 2700 रुपये और दो बच्चों के साथ उन्होंने नई जिंदगी शुरू की। दिन में पार्लर में काम, शाम को ट्यूशन और रात में पढ़ाई। पति की प्रताड़ना तब भी खत्म नहीं हुई, लेकिन सविता ने हार नहीं मानी।

 

उन्होंने पहले ही प्रयास में मध्य प्रदेश पीसीएस परीक्षा पास की। इसके बाद 2017 में UPSC की तैयारी की और पहले ही अटेम्प्ट में प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू पास कर IAS अधिकारी बन गईं।

 

आज सविता प्रधान एक मजबूत प्रशासनिक अधिकारी हैं और खासकर आदिवासी, दलित और गरीब महिलाओं की मदद के लिए काम कर रही हैं। उनकी कहानी सिर्फ सफलता नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष और जीत की मिसाल है।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *