बिहार के रोहतास जिले में एक ऐसी परंपरा आज भी जीवित है, जो आधुनिक विज्ञान और तकनीक के दौर को चुनौती देती नजर आती है। जहां दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को छू रही है, वहीं संझौली प्रखंड के घिन्हू ब्रह्म स्थान पर हर साल ‘भूतों का मेला’ लगता है। यह मेला चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र के दौरान आयोजित होता है और हजारों लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

करीब 2 किलोमीटर में फैले इस मेले का माहौल किसी सामान्य धार्मिक आयोजन जैसा नहीं, बल्कि रहस्यमय और कई बार डरावना होता है। यहां लोग ‘भूत-प्रेत उतारने’ के लिए आते हैं। मेले में तांत्रिक झाड़-फूंक और मंत्रोच्चार के जरिए लोगों को ठीक करने का दावा करते हैं। इस दौरान कई लोग—खासतौर पर महिलाएं—चीखती, झूमती और अजीब हरकतें करती दिखाई देती हैं, जिन्हें स्थानीय लोग ‘भूत सवार’ मानते हैं।

इस मेले की खास बात यह है कि यहां सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, झारखंड और अन्य राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं। मान्यता है कि घिन्हू ब्रह्म की कृपा से नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं और पीड़ितों को राहत मिलती है। तांत्रिकों की भूमिका यहां बेहद अहम होती है, जो कई बार कठोर तरीकों से ‘इलाज’ करते नजर आते हैं।

मेले से जुड़ी एक लोककथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि घिन्हू ब्रह्म नामक व्यक्ति ने श्राप देकर अपनी मृत्यु के बाद इस स्थान को शक्ति का केंद्र बना दिया। तभी से यहां ब्रह्म स्थान की स्थापना हुई और यह आस्था का प्रमुख स्थल बन गया।

हालांकि, इस मेले में पशु बलि और शराब को चढ़ावे के रूप में चढ़ाने जैसी प्रथाएं भी देखने को मिलती हैं, जो सवाल खड़े करती हैं। एक ओर जहां लोग इसे अपनी समस्याओं का समाधान मानते हैं, वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण इसे मानसिक और सामाजिक स्थिति से जोड़कर देखता है।

कुल मिलाकर, यह मेला आज भी आस्था और अंधविश्वास के बीच की उस पतली रेखा को दिखाता है, जहां विश्वास और विज्ञान आमने-सामने खड़े नजर आते हैं।

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