प्रकृति और संस्कृति के प्रतीक पर्व सरहुल को पूरे झारखंड के साथ-साथ बोकारो में भी हर्षोल्लास और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। इस खास अवसर पर बोकारो के विभिन्न सरना स्थलों से भव्य जुलूस निकाले गए, जो शहर के प्रमुख स्थल नया मोड़ स्थित बिरसा चौक पर आकर एक भव्य संगम में बदल गए।
इस दौरान आदिवासी समुदाय के महिला-पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में नजर आए। मांडर की थाप पर लोग झूमते-नाचते आगे बढ़ते रहे, जिससे पूरा वातावरण उत्सवमय हो गया। हर ओर रंग-बिरंगी पोशाकें, पारंपरिक गीत और नृत्य की झलक देखने को मिली, जिसने लोगों का मन मोह लिया।
नया मोड़ में इस अवसर पर लाखों की भीड़ उमड़ी। हर वर्ष की तरह इस बार भी बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग सरहुल पर्व मनाने के लिए यहां पहुंचे। लोगों ने एक-दूसरे को बधाई दी और सामूहिक रूप से इस पर्व की खुशियां साझा कीं।
सरहुल को आदिवासी समाज प्रकृति के पर्व के रूप में मनाता है। यह पर्व पेड़ों में नए फूल और फल आने की खुशी में मनाया जाता है। इस दिन लोग प्रकृति की पूजा करते हैं और अपने इष्ट देवता से अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और नए वर्ष में खुशहाली की कामना करते हैं। खेत-खलिहानों की उन्नति और पर्यावरण संतुलन के लिए भी प्रार्थना की जाती है।
पूरे आयोजन के दौरान प्रशासन भी मुस्तैद नजर आया, ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और पर्व शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो।
सरहुल का यह पर्व न सिर्फ आदिवासी संस्कृति की समृद्ध विरासत को दर्शाता है, बल्कि प्रकृति के प्रति उनके गहरे लगाव और सम्मान को भी उजागर करता है। बोकारो में इस पर्व की धूम ने एक बार फिर सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विविधता की मिसाल पेश की।
