बिहार के गया शहर में हर साल गर्मी के साथ दस्तक देने वाला जल संकट इस बार भी भयावह रूप लेता जा रहा है। मार्च महीने की शुरुआत में ही हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि नगर निगम क्षेत्र के कई इलाकों में पानी के लिए हाहाकार मच गया है। भूजल स्तर लगातार गिरते-गिरते 300 फीट से भी नीचे पहुंच चुका है, जिससे अधिकांश घरों के हैंडपंप और बोरिंग सूख चुके हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे शहर के लोगों की परेशानी भी बढ़ती जा रही है।
स्थिति को सुधारने के लिए राज्य सरकार ने साल 2022 में ‘हर घर गंगाजल’ योजना की शुरुआत की थी। इस योजना का उद्देश्य था कि गंगा नदी से पानी लाकर पाइपलाइन के जरिए हर घर तक पहुंचाया जाए, ताकि गर्मी के दिनों में भी लोगों को पीने के पानी की किल्लत न हो। लेकिन करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आज भी गया शहर के हजारों घरों तक नियमित जलापूर्ति नहीं पहुंच पा रही है।
नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार, शहर के करीब 50 हजार से अधिक घर ऐसे हैं, जहां अभी तक पानी की नियमित सप्लाई नहीं हो रही है। अगर उन कॉलोनियों और घरों को भी जोड़ लिया जाए, जो नगर निगम में पंजीकृत नहीं हैं, तो यह संख्या एक लाख से भी अधिक हो सकती है। इसका सीधा असर लगभग तीन लाख से अधिक लोगों पर पड़ रहा है, जो रोजाना पानी के लिए जूझने को मजबूर हैं।
शहर के कई इलाके इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। वार्ड संख्या 34 के गेवाल बीघा, हिंदी स्कूल क्षेत्र, पहाड़ी तल, बनिया पोखर और इकबाल नगर जैसे इलाकों में हालात बेहद खराब हैं। यहां के लोगों को रोजाना पानी के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ता है। कई बार उन्हें दूर-दराज के इलाकों से पानी ढोकर लाना पड़ता है, जिससे उनका दिन का बड़ा हिस्सा सिर्फ पानी की व्यवस्था में ही बीत जाता है।
वार्ड नंबर 34 के हिंदी स्कूल इलाके में तो स्थिति इतनी खराब है कि सुबह और शाम पानी भरने के लिए करीब 200 मीटर लंबी कतार लग जाती है। इस कतार में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे होते हैं, जो घंटों इंतजार करने के बावजूद पर्याप्त पानी नहीं जुटा पाते। कई बार तो लोगों के बीच पानी को लेकर विवाद की स्थिति भी बन जाती है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि जिन इलाकों में पाइपलाइन बिछाई जा चुकी है, वहां भी लोगों को पानी नहीं मिल रहा है। स्थानीय वार्ड पार्षद प्रतिनिधि ओम यादव बताते हैं कि इलाके में पाइपलाइन तो करीब एक साल पहले बिछाई गई थी, लेकिन उसके बाद से जलापूर्ति लगभग बंद है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने आज तक उस पाइपलाइन से पानी आते नहीं देखा।
इस वजह से लोगों को करीब 500 मीटर दूर स्थित एक बोरिंग पर निर्भर रहना पड़ता है। इस एक बोरिंग से करीब 200 परिवार अपनी जरूरत का पानी जुटाते हैं। ऐसे में वहां भी भीड़ और लंबी कतार लगना आम बात हो गई है।
स्थानीय निवासी अजित कुमार गुप्ता बताते हैं कि पाइपलाइन से पानी की सप्लाई नाम मात्र की है। कुछ जगहों तक पानी पहुंचता भी है, तो उसका दबाव इतना कम होता है कि अधिकांश घरों तक नहीं पहुंच पाता। उन्होंने कहा कि अगर यह एकमात्र बोरिंग खराब हो जाए, तो लोगों को पानी खरीदने तक की नौबत आ जाती है।
गया शहर के कई हिस्से लंबे समय से ‘ड्राई जोन’ के नाम से जाने जाते हैं। स्थानीय युवक मोहम्मद अशफाक का कहना है कि गेवाल बीघा के वार्ड 33, 34 और 35 में करीब 20 हजार से अधिक आबादी पानी के लिए तरस रही है। उनका आरोप है कि नगर निगम और बुडको के बीच जिम्मेदारी को लेकर अक्सर टालमटोल होता रहता है, जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है।
दरअसल, गया नगर निगम के 53 वार्डों में जलापूर्ति की जिम्मेदारी बुडको के पास है। गंगाजल लाने से लेकर पाइपलाइन बिछाने तक का काम इसी एजेंसी को करना है। वहीं पुराने सिस्टम के तहत कुछ क्षेत्रों में जलापूर्ति की जिम्मेदारी नगर निगम के पास है। जहां पाइपलाइन से पानी नहीं पहुंच पाता, वहां टैंकर के जरिए पानी भेजा जाता है।
दो अलग-अलग एजेंसियों के बीच जिम्मेदारी बंटी होने के कारण अक्सर समन्वय की कमी देखने को मिलती है। अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं, जिससे समस्या का समाधान नहीं हो पाता। यही कारण है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद योजना का लाभ पूरी तरह लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
स्थानीय महिलाओं की परेशानी सबसे ज्यादा बढ़ गई है। अकीला खातून बताती हैं कि करीब 15 हजार की आबादी रोजाना कहीं न कहीं से पानी लाकर अपना काम चला रही है। पाइपलाइन होने के बावजूद पानी नहीं आना उनकी परेशानी को और बढ़ा देता है।
वहीं रमजान के पवित्र महीने में भी लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। अमीना खातून बताती हैं कि रोजा रखने के बावजूद उन्हें अपने बच्चों के साथ आधा किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि पीने का पानी तो वे खरीद लेती हैं, लेकिन बाकी जरूरतों के लिए उन्हें दूर से पानी ढोना पड़ता है।
नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि स्थिति को सुधारने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। नगर निगम आयुक्त अभिषेक पलासिया के अनुसार, हैंडपंप, बोरिंग और प्याऊ का सर्वे कराया गया है और जहां मरम्मत की जरूरत है, वहां काम शुरू किया जा रहा है।
बुडको के एसडीओ नील कुमार ने बताया कि शहर के करीब 1 लाख 5 हजार घरों तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अभी तक करीब 71 हजार घरों तक ही जलापूर्ति हो पा रही है। बाकी बचे करीब 40 हजार घरों को तीसरे चरण में जोड़ने की योजना है।
उन्होंने यह भी बताया कि शहर में प्रतिदिन करीब 105 एमएलडी पानी की सप्लाई की जा रही है। हालांकि कम दबाव की समस्या को दूर करने के लिए पांच नए टैंक बनाने का प्रस्ताव भी विभाग को भेजा गया है।
लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है। लोगों का कहना है कि योजनाएं और दावे अपनी जगह हैं, लेकिन असल में उन्हें रोजाना पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
मार्च महीने में ही जब हालात इतने खराब हैं, तो मई और जून की भीषण गर्मी में स्थिति और भी विकराल हो सकती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद ‘हर घर गंगाजल’ योजना का लाभ लोगों तक कब पहुंचेगा।
गया के लोगों के लिए यह सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जंग बन चुकी है, जहां हर दिन पानी के लिए संघर्ष करना उनकी मजबूरी बन गया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब तक इस संकट का स्थायी समाधान निकाल पाता है या फिर हर साल की तरह इस बार भी लोग प्यास के इस संकट से जूझते रहेंगे।
