हैदराबाद: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध का असर अब भारत के व्यापार और कृषि उत्पादों पर भी साफ दिखने लगा है। इस संघर्ष के कारण मध्य पूर्व क्षेत्र में कई समुद्री, हवाई और थल मार्ग बाधित हो गए, जिससे भारत की कृषि कंपनियां गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं। यह प्रभावशाली कलाकारों के साथ-साथ किसानों पर भी लागू होता है।

भारत अपने कृषि यंत्रों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया अर्थात मध्य पूर्व के देशों को भेजता है। वर्ष 2025 में इस क्षेत्र में करीब 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कृषि खपत हुई। लेकिन इस्लामिक युद्ध के तहत यह कारोबार लगभग बंद हो गया है। बड़ी मात्रा में माल पोर्ट और प्लास्टरबोर्ड में स्टॉक जमा हो गया है, जबकि बीमा और प्लास्टिक की लागत में भी तेजी से वृद्धि हुई है।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिवा (जीटीआरआई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के कारण पश्चिम एशिया में लगभग 11.8 अरब डॉलर यानी करीब 1 लाख करोड़ रुपये का कृषि-खाद्य मिश्रण खतरा पैदा हो गया है। इसमें चावल, फल और मसाले जैसे कई प्रमुख उत्पाद शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के विभिन्न बंदरगाहों पर 3,000 से ज्यादा लोग डूबे हुए हैं।

सबसे ज्यादा असरदार बासमती चावल के मिश्रण पर आधारित है। जानकारी के मुताबिक करीब 4 लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों या रास्ते में फंसा हुआ है। युद्ध के कारण कई प्लेस्टेशन रूट बाधित हो गए, जिससे माले के पौधे प्रभावित हो रहे हैं। साथ में ही लेपिस्टिक लागत भी लगभग पूरी हो गई है, जिससे मिक्स को भारी नुकसान हो रहा है।

ईरान, भारत के बासमती चावल का एक प्रमुख आयातक देश है और कुल मिलाकर इसका हिस्सा 25 प्रतिशत से अधिक माना जाता है। अस्थायित्व के कारण ईरान में होने वाली कई शिपमेंट रुकावटें रुकी हुई हैं।

आंकड़ों के मुताबिक साल 2024-25 के दौरान भारत ने करीब 60 लाख 65 हजार टन से ज्यादा बासमती चावल का उत्पादन किया, अनुमानित कीमत करीब 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा रही। वहीं क्रिसिल रेटिंग्स की रिपोर्ट बताती है कि भारत के बासमती का प्रदर्शन पश्चिम एशिया के देशों से लगभग 70 से 72 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में युद्ध में भारत के किसानों और किसानों पर बड़ा असर पड़ सकता है।

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