कद छोटा, सपने बड़े! दिव्यांग भाई-बहन की इंजीनियर बनने की जिद, गरीबी और बदहाल रास्ते बन रहे बाधा

कहते हैं कि हौसले बुलंद हों तो मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मंजिल की राह रोकी नहीं जा सकती। गया जिले के सुदूर एरकी गांव के 18 वर्षीय दीपक और 16 वर्षीय करिश्मा इसकी मिसाल हैं। दोनों भाई-बहन दिव्यांग हैं, आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है, लेकिन सपने आसमान से भी ऊंचे हैं। दोनों इंजीनियर बनना चाहते हैं और तमाम मुश्किलों के बावजूद पढ़ाई जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं।

 

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दीपक की लंबाई करीब तीन फीट और करिश्मा की करीब साढ़े तीन फीट है। कम कद को लेकर कभी लोग उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन पढ़ाई और अपनी प्रतिभा के दम पर दोनों ने लोगों की सोच बदलने की कोशिश की है। करिश्मा फिलहाल इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रही है और उसका कहना है कि वह सिर्फ इंजीनियर बनने का सपना नहीं देखती, बल्कि इंजीनियर बनकर दिखाना चाहती है।

 

वहीं, दीपक ने वर्ष 2025 में प्रथम श्रेणी से मैट्रिक की परीक्षा पास की। पैर में गंभीर समस्या के कारण उसके लिए चलना मुश्किल है। वह छोटी साइकिल के सहारे आवागमन करता है। आर्थिक तंगी के कारण आगे की पढ़ाई फिलहाल रुक गई है। दीपक का कहना है कि बेहतर इलाज और सरकारी मदद मिले तो वह दोबारा पढ़ाई शुरू करना चाहता है। वह कॉमेडी के क्षेत्र में भी अपना करियर बनाने की कोशिश कर रहा है और अभिनेता जॉनी लीवर का प्रशंसक है।

 

दोनों भाई-बहन को अब तक ट्राइसाइकिल भी नहीं मिल सकी है। परिवार का कहना है कि कई बार स्थानीय स्तर पर इसकी मांग की गई, लेकिन सिर्फ आश्वासन मिला। मां जगनी देवी मजदूरी और थोड़ी-बहुत खेती के सहारे बच्चों की पढ़ाई और इलाज का खर्च उठा रही हैं। उन्होंने बच्चों के भविष्य के लिए जमीन तक बेच दी है।

 

करिश्मा की पढ़ाई की राह में एक और बड़ी बाधा मुहाने नदी है। बरसात के दिनों में नदी में पानी बढ़ जाने के कारण उसे स्कूल जाने में परेशानी होती है और कई दिनों तक पढ़ाई छूट जाती है। स्थानीय मुखिया प्रदीप कुमार के मुताबिक नदी पर पुल नहीं होने से आसपास के कई गांवों के बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

 

मुखिया ने बताया कि ट्राइसाइकिल के लिए पांच लोगों की अनुशंसा की गई थी, जिनमें तीन को लाभ मिल चुका है। दीपक और करिश्मा को जल्द ट्राइसाइकिल दिलाने का प्रयास जारी है।

 

इन दोनों भाई-बहन की कहानी बताती है कि सुविधाओं का अभाव उनके हौसले को नहीं तोड़ पाया है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि सरकारी मदद समय पर पहुंचे, ताकि इनकी उड़ान मंजिल तक पहुंच सके।

 

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