बिहार के एक गांव में शिक्षा व्यवस्था की तस्वीरें सामने आई हैं, जहां छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल भवन तक पढ़ने के लिए नहीं भेजा जाता। कोरमथु गांव के प्राथमिक विद्यालय में भवन नहीं होने के कारण बच्चों को पेड़ के नीचे और आसपास के घरों में बरामदे में पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है।

स्कूल के पास ही रहने वाली स्थानीय महिला कौशल्या देवी ने बच्चों की परेशानी को देखते हुए मानवीय का उदाहरण पेश किया है। उन्होंने अपने घर के सामने पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाई करने की सुविधा दे दी है। बच्चे उनके घर से बरामद होकर भी छुपे हुए हैं। कौशल देवी कहती हैं, “मुझे अच्छा नहीं लगा कि छोटे-छोटे बच्चे भेड़-बकरियों की तरह एक कमरे में ठूंसे हुए जानवर हैं। इसलिए मैंने अपने घर के सामने पेड़ के नीचे पढ़ने की आज्ञा दे दी। सरकार को जल्द से जल्द व्यवस्था करनी चाहिए।”

गाँव में लगभग 100 से अधिक घर हैं और जनसंख्या का अनुपात 300 से अधिक बच्चों की शिक्षा की आयु है। लेकिन स्कूल में पर्याप्त जगह नहीं होने के कारण कई अभिभावक अपने बच्चों का नामांकन ही नहीं करा रहे हैं। इससे बच्चों की शिक्षा पर गंभीर असर पड़ रहा है।

स्कूल के शिक्षक इमरोज अली और बदरुद्दीन के सहायकों का कहना है कि यह स्कूल वर्ष 1996 में बना था और उस समय यहां दो कमरे भी थे। लेकिन समय के साथ भवन बर्बाद हो गया। वर्ष 2020 के बाद डीएम-फुटे भवन गिर गया, लेकिन अब तक नया भवन नहीं मिला।

इंस्टिट्यूट के अनुसार नए भवन के निर्माण के लिए टेंडर भी निकाला गया था, लेकिन इतने वर्षों बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ। शिक्षक का कहना है कि इस स्कूल में किसी अन्य स्कूल का मर्ज समाधान नहीं है, क्योंकि यहां ज्यादातर बच्चे दलित और महादलित समुदाय के लोग आते हैं। अगर स्कूल छूट गया तो कई बच्चे पढ़ाई छोड़ सकते हैं।

जिला शिक्षा विभाग के अनुसार जिले में करीब 150 स्कूल ऐसे हैं जिनके पास अपना भवन नहीं है। इनमें से 23 स्कलों के भवन निर्माण को मंजूरी मिल गई है, लेकिन शेष स्कलों की स्थिति अब भी जस की तस बनी हुई है। वहीं जब जिला शिक्षा मंत्री कृष्ण मुरारी गुप्ता से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने इस मामले में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी।

प्रश्न में यह है कि जब शिक्षा के अधिकार की बात होती है, तब इन बच्चों को ऐसे सुझाव कब देना चाहिए।

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