बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar अब राज्यसभा की ओर बढ़ रहे हैं। बीते गुरुवार को उन्होंने बिहार विधानसभा में राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन पर्चा दाखिल किया। इस दौरान उनके साथ Amit Shah और बिहार बीजेपी अध्यक्ष Nitin Nabin भी मौजूद रहे। खास बात यह रही कि अमित शाह दिल्ली से विशेष तौर पर पटना पहुंचे थे।

 

नामांकन से पहले नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट करते हुए लिखा कि वे अब तक लोकसभा, बिहार विधानसभा और बिहार विधान परिषद तीनों सदनों के सदस्य रह चुके हैं और अब राज्यसभा जाना चाहते हैं। उनके इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में यह चर्चा तेज हो गई कि लंबे समय से जारी ‘नीतीशकाल’ अब एक नए मोड़ पर पहुंच रहा है।

 

दरअसल, नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर की औपचारिक शुरुआत साल 1985 में हुई थी, जब वे पहली बार बिहार विधानसभा के लिए चुने गए थे। यह चुनाव उनके जीवन का सबसे अहम चुनाव माना जाता है। इससे पहले वे 1977 और 1980 के विधानसभा चुनाव हार चुके थे। उस समय उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी और हरनौत सीट से उनके प्रतिद्वंद्वी अरुण चौधरी धनबल के मामले में उनसे काफी आगे थे।

 

दिवंगत पत्रकार Sankarshan Thakur ने अपनी किताब Single Man: The Life & Times of Nitish Kumar of Bihar में लिखा है कि उस समय नीतीश कुमार ने अपनी पत्नी मंजू से वादा किया था कि यदि 1985 का चुनाव भी हार गए तो वे हमेशा के लिए राजनीति छोड़ देंगे। इस वादे के बाद उनकी पत्नी ने उन्हें चुनाव प्रचार के लिए 20 हजार रुपये दिए, जो उस दौर में बड़ी रकम मानी जाती थी।

 

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में कांग्रेस की लहर थी। इसी वजह से नीतीश कुमार ने उस साल लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा और राजनीतिक हालात को भांपते हुए 1985 के विधानसभा चुनाव पर फोकस किया। उस चुनाव में उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री Chandra Shekhar और किसान नेता Devi Lal का भी समर्थन मिला।

 

बेहतर चुनाव प्रबंधन और रणनीति के दम पर नीतीश कुमार ने हरनौत सीट से 22 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की। यही जीत उनके लंबे राजनीतिक सफर की नींव बनी। इसके दो दशक बाद 2005 में बिहार में ‘नीतीशकाल’ की शुरुआत हुई, जो अब 2026 में एक नए अध्याय की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।

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