बिहार की राजनीति में जाति और धर्म अक्सर चुनावी समीकरण तय करते हैं, लेकिन पटना की बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में एक ऐसी उम्मीदवार मैदान में हैं, जो खुद को न किसी जाति से जोड़ती हैं और न किसी धर्म से। उनकी पहचान सिर्फ एक किन्नर और समाजसेवी की है। निर्दलीय प्रत्याशी प्रिया किन्नर ने हाथ में संविधान लेकर नामांकन दाखिल किया और समान अधिकार व लोकतंत्र का संदेश दिया।
प्रिया किन्नर का कहना है कि संविधान ने उन्हें बराबरी का अधिकार दिया है और उसी अधिकार के बल पर वे चुनाव लड़ रही हैं। उनका पहले का नाम प्रियांशु राज था, लेकिन थर्ड जेंडर पहचान सामने आने के बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर प्रिया किन्नर रख लिया। उन्होंने राजनीति शास्त्र में स्नातक किया है और समाज सेवा को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती हैं।
प्रिया कहती हैं कि उनका जन्म कायस्थ परिवार में हुआ, लेकिन अब वे खुद को किसी जाति या धर्म तक सीमित नहीं मानतीं। उनका दावा है कि हर समाज के लोग उन्हें बेटी की तरह अपनाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान भी लोगों का यही स्नेह उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दे रहा है।
महिलाओं की सुरक्षा, गरीब और अति पिछड़े वर्ग के बच्चों की शिक्षा तथा युवाओं को नशे से बचाना उनके चुनावी एजेंडे के प्रमुख मुद्दे हैं। उनका कहना है कि नेता अक्सर जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते, इसलिए उन्होंने खुद चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया।
चुनाव खर्च को लेकर प्रिया का कहना है कि जनता और शुभचिंतकों का सहयोग ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। भाजपा, राजद और जन सुराज जैसे बड़े दलों से मुकाबले पर उनका कहना है कि उनकी लड़ाई किसी पार्टी से नहीं, बल्कि जनता का विश्वास जीतने की है।
प्रिया किन्नर ने राजनीति में किन्नर समाज के लिए दो प्रतिशत आरक्षण की मांग भी उठाई। साथ ही बिहार किन्नर कल्याण बोर्ड की निष्क्रियता पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि शिक्षा, सम्मान और अवसर मिलने पर किन्नर समाज भी मुख्यधारा में बेहतर योगदान दे सकता है।
अब सबकी नजर 30 जुलाई को होने वाले मतदान और 3 अगस्त को आने वाले चुनाव परिणाम पर टिकी है, जो तय करेगा कि बांकीपुर की जनता प्रिया किन्नर के इस अनोखे चुनावी अभियान को कितना समर्थन देती है।








