बिहार की राजधानी पटना में आज भले ट्राम नहीं दिखती, लेकिन करीब 140 साल पहले यहां घोड़ों से खींची जाने वाली ट्राम शहर की पहचान हुआ करती थी। वर्ष 1886 में ब्रिटिश व्यवसायी विलियम लॉयड ने पटना सिटी के चौक से बांकीपुर (वर्तमान गांधी मैदान क्षेत्र) तक घोड़ा-चालित ट्राम सेवा शुरू की थी। उस समय यह शहर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से को जोड़ने वाला आधुनिक परिवहन साधन माना जाता था। सामान्य श्रेणी का किराया केवल एक आना था और शुरुआती महीनों में इस सेवा से अच्छी कमाई भी हुई।
इतिहासकारों के अनुसार, इस परियोजना में स्थानीय समाजसेवी और व्यवसायियों ने भी निवेश किया था। लेकिन समय के साथ ट्राम की धीमी रफ्तार, खराब प्रबंधन, बार-बार रुकने, सिंगल ट्रैक, दुर्घटनाओं और घटती सवारियों ने इसकी लोकप्रियता कम कर दी। उस दौर के अखबार ‘अल-पंच’ ने ट्राम व्यवस्था की अव्यवस्था पर तीखी टिप्पणियां प्रकाशित की थीं। आखिरकार वर्ष 1903 में पटना की ट्राम सेवा बंद हो गई।
भारत में ट्राम की शुरुआत 1873 में कोलकाता से हुई थी। इसके बाद मुंबई, पटना, नासिक, चेन्नई, कानपुर और दिल्ली जैसे शहरों में भी ट्राम चली, लेकिन धीरे-धीरे सभी जगह सेवाएं बंद होती गईं। आज केवल कोलकाता में ही आधुनिक इलेक्ट्रिक ट्राम धरोहर के रूप में संचालित हो रही है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में ट्राम को आधुनिक रूप में फिर से विकसित करने की पहल के बाद पटना में भी इसकी वापसी की मांग तेज हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा किनारे हेरिटेज ट्राम शुरू करने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और शहर को एक नई पहचान मिल सकती है।
अनुग्रह नारायण सिंह शोध संस्थान के प्रोफेसर डॉ. बी. एन. प्रसाद का कहना है कि विरासत और आधुनिकता का संतुलन बनाए रखने के लिए पटना में ट्राम सेवा दोबारा शुरू करने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। वहीं स्थानीय लोगों का मानना है कि ट्राम न सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर को जीवित करेगी, बल्कि पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति देगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक इलेक्ट्रिक ट्राम प्रदूषणमुक्त, ऊर्जा-कुशल और सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन का बेहतर विकल्प है। यदि इसे योजनाबद्ध तरीके से शुरू किया जाए, तो पटना के ट्रैफिक और वायु प्रदूषण को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।







