भोजपुरी दिवस पर फिर उठी आठवीं अनुसूची की मांग, 8 करोड़ लोगों की जुबान बनी वैश्विक पहचान

पटना: संत कबीर जयंती के अवसर पर देश-विदेश में भोजपुरी दिवस उत्साह के साथ मनाया गया। इस मौके पर भोजपुरी की समृद्ध साहित्यिक विरासत को याद करते हुए इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग एक बार फिर तेज हो गई। साहित्यकारों और भाषाविदों का कहना है कि भोजपुरी अब केवल भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक पहचान वाली भाषा बन चुकी है।

विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया भर में 7 से 8 करोड़ से अधिक लोग भोजपुरी बोलते या समझते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना में करीब 5.1 करोड़ लोगों ने इसे अपनी मातृभाषा बताया था। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में भोजपुरी व्यापक रूप से बोली जाती है। वहीं नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना और त्रिनिदाद एवं टोबैगो सहित 10 से अधिक देशों में भी भोजपुरी भाषी समुदाय अपनी भाषा और संस्कृति को आज भी जीवंत बनाए हुए है।

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भोजपुरी के कवि, समीक्षक और बिहार सरकार में उपनिदेशक डॉ. सुनील कुमार पाठक ने बताया कि चित्रकूट अधिवेशन में सहमति बनी थी कि संत कबीर जयंती पर भोजपुरी दिवस मनाया जाएगा। तभी से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है। उनके अनुसार संत कबीर की साखियों और पदों में लोकभाषा, विशेषकर भोजपुरी की स्पष्ट छाप दिखाई देती है, इसलिए उन्हें भोजपुरी अस्मिता का प्रमुख प्रतीक माना जाता है।

डॉ. पाठक ने कहा कि भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि समृद्ध साहित्यिक परंपरा वाली विकसित भाषा है। इसमें व्याकरण, भाषा विज्ञान, काव्यशास्त्र, 50 से अधिक नाटक, 100 से अधिक उपन्यास और 50 से अधिक महाकाव्य उपलब्ध हैं। उन्होंने प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र के भोजपुरी साहित्य में योगदान का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि भोजपुरी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की सभी आवश्यक योग्यताएं रखती है। बिहार सरकार पहले ही केंद्र सरकार को इसकी अनुशंसा भेज चुकी है। भोजपुरी समाज और साहित्यकारों को उम्मीद है कि निकट भविष्य में इस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलेगा, जिससे इसकी सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान को नई मजबूती मिलेगी।

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