सहरसा सदर अस्पताल की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। अस्पताल से सामने आई तस्वीरें और मरीजों की शिकायतें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज के दावे आखिर जमीन पर कब उतरेंगे।
सरकार लगातार स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने, संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाने और मरीजों को बेहतर इलाज देने की बात करती है। यह भी कहा जाता है कि अस्पताल में किसी तरह की कमी होने पर जिलाधिकारी की अनुशंसा से उसे तत्काल दूर किया जाएगा। लेकिन सहरसा सदर अस्पताल की मौजूदा स्थिति इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब किसी मंत्री, जिलाधिकारी या बड़े अधिकारी का निरीक्षण होता है, तब अस्पताल की व्यवस्था चाक-चौबंद दिखाई देती है। सफाई, दवाइयों की उपलब्धता और कर्मचारियों की मौजूदगी सब कुछ बेहतर नजर आता है। लेकिन निरीक्षण खत्म होते ही हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह व्यवस्था केवल वीआईपी दौरे तक ही क्यों सीमित रहती है?
हाल ही में पटना के एक सरकारी अस्पताल में स्वास्थ्य मंत्री के औचक निरीक्षण के दौरान मुख्य चिकित्सक के ड्यूटी से गायब मिलने का मामला भी सामने आया था। उस पर कार्रवाई हुई, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार को लेकर उठ रहे सवाल अब भी बने हुए हैं।
सहरसा सदर अस्पताल में हर दिन सैकड़ों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। इनमें बड़ी संख्या गरीब और जरूरतमंद लोगों की होती है, जिनके पास निजी अस्पतालों का विकल्प नहीं होता। यदि अस्पताल की मूलभूत सुविधाएं ही बदहाल रहेंगी, तो सबसे अधिक परेशानी इन्हीं मरीजों को झेलनी पड़ेगी।
ज़रूरत केवल औचक निरीक्षण या कार्रवाई की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें जवाबदेही तय हो और सुधार स्थायी हो। अस्पताल प्रबंधन, संबंधित अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग सभी की जिम्मेदारी है कि मरीजों को सम्मानजनक और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलें।
अपना बिहार झारखंड स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन से सवाल पूछता है—आखिर आम लोगों की जिंदगी किसके भरोसे है? क्या इस बदहाल व्यवस्था के लिए कभी जिम्मेदारी तय होगी, या मरीजों की परेशानी यूं ही जारी रहेगी?






