शराबबंदी के बाद ‘सूखा नशा’ का बढ़ता जाल, बिहार के युवाओं पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

पटना: बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद नशे का स्वरूप बदलता नजर आ रहा है। शराब की जगह अब स्मैक, ब्राउन शुगर, गांजा, नशीले इंजेक्शन और सिंथेटिक ड्रग्स जैसे ‘सूखे नशे’ का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। हाजीपुर के राजकुमार की कहानी इसकी एक मिसाल है। निजी नौकरी करने वाले राजकुमार बुरी संगत में पड़कर स्मैक के आदी हो गए। हालत यह हो गई कि रोजाना 300 से 400 रुपये का नशा करने के लिए घर से चोरी तक करनी पड़ती थी। फिलहाल वह नशा मुक्ति केंद्र में इलाज के बाद नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शराबबंदी के बाद बड़ी संख्या में युवा सूखे नशे की गिरफ्त में आए हैं। बिहार में नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ने के पीछे यही वजह मानी जा रही है। सरकारी आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। वर्ष 2019 में एनडीपीएस के 697 मामले दर्ज हुए थे, जो 2024 में बढ़कर 2411 तक पहुंच गए। इसी तरह मादक पदार्थों की जब्ती और गिरफ्तारी के आंकड़ों में भी लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

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जांच एजेंसियों के अनुसार नेपाल, पूर्वोत्तर राज्यों और म्यांमार से जुड़े नेटवर्क बिहार में ड्रग्स की सप्लाई कर रहे हैं। किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, पटना, मुजफ्फरपुर, गया, भागलपुर, सीतामढ़ी और पूर्वी चंपारण जैसे जिले तस्करों के निशाने पर हैं। कई मामलों में ट्रेन और छोटे मॉड्यूल के जरिए सप्लाई चेन संचालित होने की बात सामने आई है।

विशेषज्ञों के मुताबिक नशीले इंजेक्शन और सिंथेटिक ड्रग्स युवाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रहे हैं। साझा सिरिंज के इस्तेमाल से एचआईवी संक्रमण का खतरा भी बढ़ रहा है। बिहार एड्स कंट्रोल सोसाइटी के अनुसार राज्य में हजारों लोग नशे से जुड़ी संक्रमित सुइयों के कारण एचआईवी की चपेट में आए हैं।

पुलिस और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लगातार कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल गिरफ्तारी और बरामदगी से समस्या खत्म नहीं होगी। परिवार, समाज, स्कूल, प्रशासन और जागरूकता अभियानों के संयुक्त प्रयास से ही युवाओं को इस खतरनाक जाल से बचाया जा सकता है।

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