बिहार में आरक्षण और सरकारी नौकरी से जुड़े एक अहम मामले में पटना हाईकोर्ट ने विवाहित महिलाओं के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि शादी के बाद महिला की जातिगत पहचान समाप्त नहीं होती है। अगर किसी महिला के जाति प्रमाणपत्र में पिता की जगह पति का नाम दर्ज है, तो सिर्फ इसी आधार पर प्रमाणपत्र को अमान्य नहीं किया जा सकता। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने बिहार लोक सेवा आयोग यानी BPSC को एक महिला डॉक्टर को अनुसूचित जाति आरक्षण के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया है।
दरअसल, यह पूरा मामला डॉ. सुषमा शरण से जुड़ा है। उन्होंने BPSC के विज्ञापन संख्या 20/2017 के तहत स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में सहायक प्राध्यापक पद के लिए आवेदन किया था। उन्होंने अनुसूचित जाति महिला आरक्षित श्रेणी से अपनी उम्मीदवारी पेश की थी।
इस भर्ती प्रक्रिया के तहत कुल 74 पदों पर नियुक्ति होनी थी, जिनमें 13 पद अनुसूचित जाति के लिए और पांच पद अनुसूचित जाति महिला अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित थे। 28 फरवरी 2018 को उनका साक्षात्कार हुआ, लेकिन 8 अगस्त 2019 को जारी अंतिम परिणाम में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।
BPSC की दलील थी कि उनके जाति प्रमाणपत्र में पिता की जगह पति का नाम दर्ज था। आयोग ने उन्हें सही प्रमाणपत्र जमा करने के लिए नोटिस भी दिया था। प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं होने के आधार पर उनकी उम्मीदवारी को अनुसूचित जाति महिला श्रेणी के बजाय अनारक्षित श्रेणी में रखा गया।
इसके बाद डॉ. सुषमा शरण ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी ओर से कहा गया कि भर्ती विज्ञापन में जाति प्रमाणपत्र पर पिता का नाम दर्ज होना अनिवार्य नहीं था। साथ ही उनके पिता और पति दोनों अनुसूचित जाति समुदाय से हैं।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह और न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडेय की खंडपीठ ने की। अदालत ने BPSC की अपील खारिज करते हुए एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर होता है और विवाह के बाद महिला की जाति नहीं बदलती। जब भर्ती विज्ञापन में पिता का नाम दर्ज करने की अनिवार्यता नहीं थी, तब केवल पति का नाम होने के आधार पर महिला को आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता।
इस आदेश के साथ ही हाईकोर्ट ने BPSC को डॉ. सुषमा शरण को अनुसूचित जाति आरक्षण के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया है।





