मुजफ्फरपुर में वेश्यालय के आंगन की मिट्टी से बनती है मां दुर्गा की प्रतिमा, सदियों पुरानी परंपरा में छिपा सामाजिक समानता का संदेश

भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहार आस्था के साथ सामाजिक समरसता और मानवीय गरिमा का संदेश भी देते हैं। मुजफ्फरपुर में दुर्गा पूजा से जुड़ी एक ऐसी ही परंपरा प्रचलित है, जो समाज की सोच पर सवाल खड़े करती है। मान्यता है कि मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में वेश्यालय के आंगन की मिट्टी भी मिलाई जाती है। शहर के पुराने रेड लाइट इलाके चतुर्भुज स्थान की यह परंपरा सामाजिक भेदभाव के बीच सम्मान और समानता का संदेश देती है।मुजफ्फरपुर में शारदीय नवरात्र को लेकर मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। मूर्तिकार मिट्टी, पुआल और अन्य सामग्रियों से देवी की प्रतिमाएं तैयार करने में जुटे हैं। इसी बीच चतुर्भुज स्थान की एक खास परंपरा चर्चा में है। यहां रहने वाली महिलाओं के घर के आंगन की मिट्टी को दुर्गा प्रतिमा निर्माण के लिए शुभ माना जाता है।

मुजफ्फरपुर में शारदीय नवरात्र को लेकर मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। मूर्तिकार मिट्टी, पुआल और अन्य सामग्रियों से देवी की प्रतिमाएं तैयार करने में जुटे हैं। इसी बीच चतुर्भुज स्थान की एक खास परंपरा चर्चा में है। यहां रहने वाली महिलाओं के घर के आंगन की मिट्टी को दुर्गा प्रतिमा निर्माण के लिए शुभ माना जाता है।

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चतुर्भुज स्थान की रहने वाली सना, बदला हुआ नाम, बताती हैं कि दुर्गा पूजा के दौरान लोग उनके घर के आंगन की मिट्टी लेने आते हैं। इसके बदले 251 या 551 रुपये शगुन के रूप में भी दिए जाते हैं। उनके मुताबिक, इस परंपरा से उन्हें सम्मान का एहसास होता है। वहीं, सेक्स वर्कर की बेटी नसीमा भी इसे पुरानी और पवित्र परंपरा मानती हैं।

प्रतिमा निर्माता विक्की कुमार के अनुसार, वह 20 वर्षों से अधिक समय से मूर्ति निर्माण कर रहे हैं। बंगाल में इस परंपरा का प्रचलन अधिक है, जबकि बिहार में इसे मानने वाले कारीगर कम हैं। अलग-अलग स्थानों की मिट्टी मिलाकर प्रतिमा बनाने की मान्यता है।

बंगाली समाज से जुड़े देव आशीष बताते हैं कि इस परंपरा के पीछे एक धार्मिक लोककथा प्रचलित है। इसका संदेश है कि भक्ति और समर्पण के सामने किसी की सामाजिक पहचान छोटी नहीं होती।

चतुर्भुज स्थान अपनी प्राचीन विष्णु मंदिर के लिए भी जाना जाता है। पुजारी नवल किशोर मिश्रा के अनुसार, इलाके की बदली हुई छवि के कारण लोग मंदिर आने से कतराते हैं। ऐसे में यह परंपरा सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर समानता और सम्मान की भावना अपनाने का संदेश देती है।

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