पूर्वी चंपारण में बिना वैध आदेश और कानूनी प्रक्रिया के आम लोगों के घर गिराने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस राज कुमार की एकल पीठ ने प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए इसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना है। कोर्ट ने पीड़ितों को अंतरिम मुआवजा देने के साथ पूरे मामले की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं।
मामला पूर्वी चंपारण जिले के पताही ब्लॉक के बेतौना और पदुमकेर गांव का है। विष्णु शंकर सिंह, विनोद कुमार सिंह और अरबिंद कुमार सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि 11 अप्रैल 2017 को उनके घर और पक्की बाउंड्री वॉल को बिना किसी कानूनी नोटिस या अंतिम आदेश के ध्वस्त कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 2015 में पंजीकृत बिक्री विलेख के जरिए जमीन खरीदी थी और शांतिपूर्वक उस पर रह रहे थे। स्थानीय हाई स्कूल से जुड़े विवाद के बीच अतिक्रमण का मामला शुरू किया गया, लेकिन अंतिम आदेश पारित होने से पहले ही जेसीबी से निर्माण गिरा दिया गया।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि अधिकारियों ने घर नहीं गिराया, बल्कि उग्र भीड़ ने तोड़फोड़ की थी। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि प्रशासन और पुलिस बल की मौजूदगी में तोड़फोड़ होती रही और अधिकारी मूकदर्शक बने रहे।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी का घर तोड़ना बेहद गंभीर मामला है और केवल मौद्रिक मुआवजा ही उसके नुकसान की भरपाई का एक माध्यम हो सकता है। अदालत ने कहा कि घर सिर्फ चार दीवारें नहीं, बल्कि परिवार की पहचान और आश्रय से जुड़ा होता है।
हाईकोर्ट ने माना कि कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 300-A से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने पूर्वी चंपारण के कमिश्नर को दो महीने के भीतर अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया है। विष्णु शंकर सिंह को 1.50 लाख रुपये, जबकि विनोद कुमार सिंह और अरबिंद कुमार सिंह को 2-2 लाख रुपये देने का आदेश है।
इसके अलावा कमिश्नर को तीन महीने के भीतर विस्तृत जांच कर वास्तविक नुकसान का आकलन करने और बकाया मुआवजा तय करने का निर्देश दिया गया है। चूंकि जिलाधिकारी इस मामले में पक्षकार थे, इसलिए मुआवजे के निर्णय से उन्हें अलग रखा गया है।





