चलती ट्रेन में जब एक गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से तड़पने लगी और आसपास कोई अस्पताल मौजूद नहीं था, तब तीन युवा महिला डॉक्टर देवदूत बनकर सामने आईं। अपनी सूझबूझ, प्रशिक्षण और साहस के दम पर उन्होंने ट्रेन के भीतर ही सुरक्षित प्रसव कराकर मां और नवजात दोनों की जान बचा ली। यह प्रेरणादायक घटना वाराणसी के पास सामने आई है।
कर्नाटक के हासन स्थित श्री धर्मस्थल मंजूनाथेश्वर आयुर्वेद कॉलेज की तीन पोस्टग्रेजुएट मेडिकल छात्राएं—डॉ. रश्मि बिलागी, डॉ. लताश्री एन. और डॉ. शाहीन एम.—राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए ट्रेन से वाराणसी जा रही थीं। यात्रा के दौरान उनके पास बैठी गर्भवती महिला अनिता देवी को अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।
स्थिति गंभीर थी और अस्पताल पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में तीनों डॉक्टरों ने तुरंत रेलवे स्टाफ को सूचना दी। उपलब्ध सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने कॉलेज में प्राप्त प्रशिक्षण और आपसी समन्वय का उपयोग करते हुए महिला का सुरक्षित प्रसव कराया।
डॉ. रश्मि और डॉ. शाहीन ने बताया कि बच्चे के जन्म के बाद प्लेसेंटा बाहर आने में थोड़ी देरी हुई। उन्होंने सावधानीपूर्वक मां की देखभाल की, पेट की हल्की मालिश की और आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रिया अपनाई। इसके बाद साफ धागे और स्टरलाइज्ड शेविंग ब्लेड की मदद से गर्भनाल को सुरक्षित तरीके से काटा गया। नवजात को तुरंत मां की छाती पर रखा गया ताकि उसे शरीर की गर्माहट मिल सके।
इसके बाद रेलवे स्टाफ की मदद से मां और नवजात को एम्बुलेंस के जरिए नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टरों ने कहा कि यह उनके जीवन का पहला ऐसा अनुभव था और दोनों के सुरक्षित होने की खुशी उन्हें हमेशा याद रहेगी।
प्रसूता अनिता देवी ने बताया कि वह बेंगलुरु से अपने बिहार स्थित गांव जा रही थीं क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण बड़े अस्पताल में इलाज संभव नहीं था। उन्होंने डॉक्टरों और रेलवे कर्मचारियों का आभार जताते हुए कहा कि उनकी मदद से आज वह और उनका बच्चा पूरी तरह सुरक्षित हैं।
कॉलेज के निदेशक प्रसन्न कुमार ने इस कार्य को संस्थान के लिए गर्व का क्षण बताते हुए कहा कि सीमित संसाधनों में भी उनकी छात्राओं ने उत्कृष्ट प्रशिक्षण, सेवा भावना और मानवीय संवेदनाओं का परिचय दिया है।







