लड़कियों से दो बार हार, फिर बने इंटरनेशनल रेसलर: गया के शुभम पहलवान बदल रहे नक्सल प्रभावित इलाके की तस्वीर

गया के इमामगंज के शुभम कुमार उर्फ शुभम पहलवान की कहानी संघर्ष, मेहनत और जज़्बे की मिसाल है। कभी दंगल में दो बार लड़कियों से हारने के बाद शर्मिंदगी महसूस करने वाले शुभम आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर चुके हैं।

महज 17 साल की उम्र में उन्होंने कुश्ती की शुरुआत की। औरंगाबाद के लॉर्ड बुद्धा स्कूल में शिक्षक तिवारी सर के मार्गदर्शन में अभ्यास शुरू किया। शुरुआती दिनों में लड़कियों से मिली हार ने उन्हें झकझोर दिया, लेकिन उन्होंने इसे कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लिया। घंटों अभ्यास और बेहतर तकनीक पर मेहनत का नतीजा यह रहा कि उन्होंने राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कुल 27 पदक अपने नाम किए।

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शुभम ने सहरसा में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में पहला स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद 2017 में चंडीगढ़ में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहला नेशनल मेडल हासिल किया। नेपाल में अंडर-19 अंतरराष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता में कांस्य पदक और 2021 में श्रीलंका में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पावर लिफ्टिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने देश का गौरव बढ़ाया।

आर्थिक चुनौतियों के बावजूद शुभम का सपना ओलंपिक में पदक जीतना या राष्ट्रीय कोच बनना है। साथ ही उन्होंने अपने नक्सल प्रभावित क्षेत्र इमामगंज में निशुल्क खेल अकादमी शुरू की है, जहां बच्चों को कुश्ती, कबड्डी, पावर लिफ्टिंग और जैवलिन थ्रो का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

उनकी मेहनत का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। शुभम के मार्गदर्शन में तैयार अंडर-14 कबड्डी टीम ने हरिद्वार में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता है, जबकि उनकी एक टीम अब किर्गिस्तान में होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने की तैयारी कर रही है।

हालांकि शुभम ग्रामीण खेल मैदानों की बदहाल स्थिति को लेकर चिंतित हैं। उनका आरोप है कि कई स्टेडियमों की देखरेख नहीं हो रही और वहां मवेशी बांधे जा रहे हैं, जिससे खेल सुविधाएं बर्बाद हो रही हैं।

शुभम का कहना है कि इमामगंज में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। सही प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलें तो यह क्षेत्र आने वाले समय में देश को कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दे सकता है।

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