पटना: बिहार में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर सरकार अब सख्त कदम उठाने की तैयारी में है। विजिलेंस विभाग के आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के मामले राजस्व विभाग (करीब 30%) से सामने आते हैं, जबकि पुलिस विभाग (लगभग 28%) दूसरे स्थान पर है। ऐसे में नवनियुक्त मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बड़ा फैसला लेते हुए अंचल कार्यालयों और थानों की निगरानी सीधे मुख्यमंत्री सचिवालय से करने की घोषणा की है। यह नई व्यवस्था 29 मई से लागू की जाएगी।

सरकार का मानना है कि बिहार को विकसित राज्यों की श्रेणी में लाने के लिए भ्रष्टाचार पर नियंत्रण बेहद जरूरी है। खासकर राजस्व विभाग में जमीन, दाखिल-खारिज और म्यूटेशन से जुड़े मामलों में सबसे अधिक रिश्वत की शिकायतें मिलती हैं। वहीं पुलिस विभाग में एफआईआर दर्ज करने, जांच प्रक्रिया और केस मैनेजमेंट में गड़बड़ी के कारण कार्रवाई होती रही है।

विजिलेंस, आर्थिक अपराध इकाई और स्पेशल विजिलेंस यूनिट जैसी एजेंसियां भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए काम कर रही हैं। इसके बावजूद एक सर्वे के अनुसार बिहार भ्रष्टाचार के मामले में देश में दूसरे स्थान पर है, जहां 75% लोगों ने माना कि उन्हें अपना काम कराने के लिए घूस देनी पड़ती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या भी है। एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डॉ. बीएन प्रसाद के अनुसार, बाजारवाद, उपभोक्तावाद और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव से लोगों में भौतिक इच्छाएं बढ़ी हैं, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। उनका कहना है कि सख्त कानून के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों और जन-जागरूकता को मजबूत करना जरूरी है।

वहीं राजनीतिक विश्लेषक डॉ. संजय कुमार का मानना है कि अगर ब्लॉक, अंचल और थानों के स्तर पर पारदर्शिता लाई जाए, तो आम लोगों को बड़ी राहत मिल सकती है। ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार, ट्रांसफर-पोस्टिंग में पारदर्शिता और अधिकारियों की नियमित समीक्षा जैसे कदम भ्रष्टाचार कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं।

सरकार की इस नई पहल से उम्मीद जगी है, लेकिन इसे जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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