पटना: बिहार में नेताओं के बीच वीआईपी सुरक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार का दावा है कि सुरक्षा व्यवस्था खतरे और पद के आधार पर तय होती है, लेकिन विशेषज्ञ इसे अब “स्टेटस सिंबल” मानने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि कई मामलों में सुरक्षा का उपयोग प्रभाव दिखाने और कद बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

राज्य में सुरक्षा की कई श्रेणियां हैं—जेड प्लस, जेड, वाई प्लस, वाई और एक्स। सबसे उच्च जेड प्लस सुरक्षा में करीब 55 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, जबकि जेड में 22 और वाई प्लस में लगभग 11 कर्मी शामिल होते हैं। एक्स श्रेणी सबसे निचली है, जिसमें सिर्फ 2 सुरक्षाकर्मी मिलते हैं।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ,  लालू प्रसाद यदव और जीतन राममांझी को जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई है। वहीं जेड और वाई प्लस श्रेणी में कई अन्य नेता शामिल हैं।

विशेषज्ञ अरुण पांडे का कहना है कि जरूरतमंद और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को सुरक्षा मिलना सही है, लेकिन “अनावश्यक मांग” इसे स्टेटस सिंबल बना रही है। उनका आरोप है कि कई बार सुरक्षा कर्मियों का दुरुपयोग निजी कामों में भी होता है, जो सरकारी संसाधनों पर बोझ है।

वरिष्ठ पत्रकार केके लाल मानते हैं कि नेता सुरक्षा के जरिए क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखाना चाहते हैं। उनके अनुसार सत्ता पक्ष अपने हिसाब से सुरक्षा बढ़ाता-घटाता है।

विपक्ष ने भी सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाया है। आरजेडी  तेजस्वी यादव नेता की सुरक्षा घटाए जाने को लेकर सवाल उठे हैं। वहीं जेडीयू प्रवक्ता राजीव रजन इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं कि सभी फैसले समीक्षा समिति की सिफारिशों पर आधारित होते हैं।

कुल मिलाकर बिहार में वीआईपी सुरक्षा अब केवल सुरक्षा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक ताकत, प्रभाव और छवि से भी जुड़ता नजर आ रहा है।

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