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बिहार के दो जुनूनी संग्रहकर्ता: अपनी पूरी कमाई से बचा रहे इतिहास की धरोहर

पटना: बिहार में इतिहास और विरासत को सहेजने की एक अनोखी मिसाल देखने को मिल रही है. पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रांतोष कुमार दास और पटना निवासी आदित्य जालान ने अपनी जिंदगी की गाढ़ी कमाई लगाकर निजी संग्रहालय स्थापित किए हैं, जो आज लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं.

भागलपुर में पूर्व आईपीएस पीके दास ने “दास ड्रिप वुड म्यूजियम” और “दास फॉसिल म्यूजियम” की स्थापना की है. उनका दावा है कि यहां शिशु पृथ्वी का पहला पत्थर, 390 मिलियन वर्ष पुराने पेड़ों के अवशेष, डायनासोर के दांतों के निशान वाले जीवाश्म और 520 मिलियन साल पुराने ट्राइलोबाइट फॉसिल जैसे दुर्लभ नमूने मौजूद हैं. पीके दास के अनुसार उन्होंने रिटायरमेंट के बाद मिले पैसे और अपनी बचत तक संग्रहालय पर खर्च कर दी. अब तक वे करीब 3 करोड़ रुपये निवेश कर चुके हैं.

दूसरी ओर, पटना के डाक बंगला चौराहे स्थित डुमरांव पैलेस में आदित्य जालान ने “बाल मनोहर जालान म्यूजियम” स्थापित किया है. लगभग एक करोड़ रुपये की लागत से बने इस संग्रहालय में 200 से 300 साल पुराने दस्तावेज, कलाकृतियां और ऐतिहासिक वस्तुएं संरक्षित हैं. आदित्य बताते हैं कि उनके दादाजी से मिली प्रेरणा ने उन्हें यह काम करने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने कहा कि संग्रहालय को बचाने के लिए परिवार ने कठिन समय में गहने तक गिरवी रख दिए थे.

संग्रहालय में पटना के पुराने शीशा उद्योग से जुड़े दुर्लभ गिलास भी रखे गए हैं, जिन पर सोने के पानी से कलाकारी की गई थी. अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर यहां लोगों के लिए निशुल्क प्रवेश और विशेष आयोजन भी किए गए.

इतिहासकार जयदेव मिश्रा का कहना है कि निजी संग्रहालय बिहार में हेरिटेज टूरिज्म, शोध और शिक्षा को नई दिशा दे सकते हैं. उनका मानना है कि सरकार और निजी संस्थाएं मिलकर काम करें तो बिहार की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत होगी.

भारत में निजी संग्रहालय खोलने के लिए ट्रस्ट, सोसाइटी या कंपनी के रूप में पंजीकरण जरूरी होता है. साथ ही सुरक्षा मानकों, स्थानीय निकायों की अनुमति और पुरावशेषों से जुड़े कानूनों का पालन करना भी अनिवार्य है.

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