बिहार के जमुई का सदर अस्पताल इन दिनों बदहाल व्यवस्था का शिकार बना हुआ है। जिले के दस प्रखंडों का बोझ उठाने वाला यह सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। हल्की बारिश में अस्पताल परिसर जलमग्न हो जाता है, दीवारों पर काई जमी है और भवनों की छतों पर पेड़-पौधे उग आए हैं। अस्पताल के अंदर शौचालय और पानी टंकियों का गंदा पानी लगातार रिसता रहता है, जिससे मरीजों और तीमारदारों को भारी परेशानी होती है।
स्थिति इतनी खराब है कि नवजात शिशु वार्ड के पास ही पोस्टमार्टम हाउस और कचरा घर मौजूद है। वार्डों में भर्ती मरीजों को सरकारी चादर तक नहीं मिल रही, जिसके कारण लोग घर से शॉल और चादर लाकर इलाज कराने को मजबूर हैं। अस्पताल परिसर में जलजमाव से गर्भवती महिलाओं और बच्चों के फिसलने का खतरा बना रहता है।
दूसरी बड़ी समस्या दवाइयों की कमी को लेकर सामने आई है। अस्पताल में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र होने के बावजूद मरीजों को डॉक्टरों द्वारा लिखी दवाएं नहीं मिल रही हैं। सोनो निवासी घायल युवक के पिता त्रिपुरारी सिंह ने आरोप लगाया कि जन औषधि केंद्र पर लिखी दवा उपलब्ध नहीं थी और दूसरी कंपनी की दवा दी जा रही थी। मजबूर होकर उन्हें बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ीं।
जन औषधि केंद्र संचालक प्रदीप कुमार यादव ने डॉक्टरों और केंद्र के बीच तालमेल की कमी तथा दवाओं की शॉर्टेज की बात स्वीकार की। वहीं सिविल सर्जन डॉ. अशोक कुमार सिंह ने दवा की कमी से इनकार करते हुए कहा कि पटना से पर्याप्त दवाएं मिल रही हैं और जर्जर पोस्टमार्टम भवन को तोड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
इधर जिलाधिकारी नवीन ने अस्पताल की व्यवस्था सुधारने का भरोसा दिया है। उन्होंने कहा कि 1 जुलाई से जमुई में “रेफर कल्चर” खत्म किया जाएगा और अस्पताल को पूरी तरह सुसज्जित बनाया जाएगा। हालांकि फिलहाल अस्पताल की जमीनी हकीकत सरकारी दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है।


