हैदराबाद : जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर इंसानी शरीर पर भी दिखाई देने लगा है. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की नई रिसर्च में दावा किया गया है कि बढ़ती गर्मी और नमी आने वाले समय में इंसानों की औसत लंबाई कम कर सकती है. रिसर्च के अनुसार गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक तापमान और ह्यूमिडिटी बच्चे की प्राकृतिक ग्रोथ को प्रभावित करते हैं, जिससे उनका कद सामान्य से छोटा रह सकता है.
स्टडी में दक्षिण एशिया के भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान जैसे देशों के 5 साल से कम उम्र के करीब 2 लाख बच्चों का अध्ययन किया गया. रिसर्चर केटी मैकमोहन के मुताबिक, जिन गर्भवती महिलाओं ने 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान झेला, उनके बच्चों की लंबाई अपेक्षा से 13 प्रतिशत तक कम पाई गई. वैज्ञानिकों का कहना है कि बचपन की लंबाई केवल कद नहीं, बल्कि दिमाग, अंगों और संपूर्ण स्वास्थ्य का संकेत भी होती है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि कम आय वाले और विकासशील देशों पर इसका खतरा ज्यादा है, क्योंकि यहां गर्मी से बचाव के संसाधन सीमित हैं. वर्ल्ड बैंक के अनुसार करीब 120 देशों पर इसका असर पड़ सकता है. रिसर्च में यह भी बताया गया कि इतिहास में भी महामारी, अत्यधिक ठंड और खराब पोषण के दौर में इंसानों की लंबाई में गिरावट देखी गई थी.
विशेषज्ञों के मुताबिक, आनुवंशिक कारणों के साथ खानपान, प्रदूषण, स्वास्थ्य सेवाएं और जलवायु भी इंसानी कद तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर जलवायु परिवर्तन पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया तो साल 2050 तक दुनिया में लाखों बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से छोटे कद के रह सकते हैं.
क्लाइमेट चेंज का असर केवल लंबाई तक सीमित नहीं है. बढ़ती गर्मी, प्रदूषण, जंगलों में आग और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह संकट इंसानी स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।


