
गया में एक महिला शिक्षिका अपनी कविताओं और भजनों के जरिए पर्यवेक्षण गृह में रह रहे बाल बंदियों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं। शास्त्री नगर निवासी हिंदी शिक्षिका सुधा मिश्रा पिछले करीब पांच वर्षों से अपने अनोखे अंदाज में बच्चों को शिक्षा के साथ नैतिकता और सकारात्मक सोच का पाठ पढ़ा रही हैं।
सुधा मिश्रा की शुरुआत अगस्त 2022 में पर्यवेक्षण गृह में प्रतिनियुक्ति से हुई। शुरुआत में उन्हें जघन्य अपराधों में शामिल बच्चों को पढ़ाने को लेकर काफी चिंता थी। लेकिन उन्होंने जल्द ही समझ लिया कि इन बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ भावनात्मक और सकारात्मक मार्गदर्शन की भी जरूरत है। उन्होंने अपनी कविताओं, भजनों और गीता के संदेशों को शिक्षा का माध्यम बनाया।
हर दिन उनकी कक्षा की शुरुआत कविता, भजन या प्रेरणादायक गीत से होती है। उनका मानना है कि इससे बच्चों का ध्यान पढ़ाई की ओर जाता है और वे धीरे-धीरे अपने भीतर बदलाव महसूस करने लगते हैं। उनकी कविता की पंक्ति “पहली लड़ाई जीतनी है अपने आप से” कई बच्चों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
सुधा बताती हैं कि एक पुराने बाल बंदी से सब्जी मंडी में मुलाकात हुई। वह युवक उन्हें पहचानकर पैर छूने आया और उनकी कविता की पंक्ति दोहराई। उसने बताया कि पढ़ाई के बाद नौकरी की संभावना कम थी, इसलिए उसने अपना रोजगार शुरू किया और अब परिवार चला रहा है। यह अनुभव सुधा के लिए बेहद भावुक और संतोषजनक था।
सुधा के इस प्रयास की अधिकारी और साथी शिक्षक भी सराहना करते हैं। गया के पर्यवेक्षण गृह में फिलहाल करीब 130 बाल बंदी हैं। यहां बच्चों को उनकी शैक्षणिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में पढ़ाया जाता है। शिक्षा के साथ उन्हें विभिन्न हुनर और व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
हिंदी और साहित्य में योगदान के लिए सुधा मिश्रा को कई सम्मान मिल चुके हैं। 2025 में अंतरराष्ट्रीय कविता प्रतियोगिता में उनकी रचना को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया था।
सुधा का मानना है कि अगर उनकी शिक्षा और कविता से एक भी बच्चा अपराध का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटता है, तो उनका प्रयास सार्थक है।





