नालंदा के सिलाव निवासी संदीप कुमार ब्रहपुरिया की जिंदगी संघर्ष, हिम्मत और मेहनत की ऐसी मिसाल है, जो हर किसी को प्रेरित करती है. बचपन गरीबी में बीता. पिता ड्राइवर थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी. वर्ष 2005 में मैट्रिक पास करने के बाद संदीप को महज 15 साल की उम्र में मजदूरी करने कोलकाता जाना पड़ा, जहां उन्होंने चाचा की गल्ला दुकान में काम किया. बाद में मुंबई में बैग कटिंग का काम करते हुए उन्हें शिक्षा का महत्व समझ आया और वे गांव लौटकर अखबार बेचते हुए दोबारा पढ़ाई करने लगे.
इसी दौरान उनकी जिंदगी में सबसे बड़ा संकट आया. वर्ष 2010 में मायोपिया और आंखों के बढ़ते प्रेशर के कारण उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई. समाज के ताने और आर्थिक तंगी ने उन्हें तोड़ने की कोशिश की, लेकिन संदीप ने हार नहीं मानी. एक साल बाद पिता का निधन हो गया, जिससे परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई. भाइयों के साथ अखबार बेचकर घर चलाते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी.
बहन और दोस्तों ने पढ़ाई में मदद की. बोल-बोलकर पढ़ाया गया और राइटर की सहायता से उन्होंने इंटर पास किया. इसके बाद मगध विश्वविद्यालय से पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. इलाज के दौरान सोशल मीडिया के जरिए उनकी जानकारी राष्ट्रीय दृष्टिबाधित संस्थान, देहरादून तक पहुंची, जहां उन्होंने नि:शुल्क शिक्षा और ऑफिस मैनेजमेंट का कोर्स किया.
संदीप ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और 11 मई 2015 को भारतीय स्टेट बैंक की सिलाव शाखा में क्लर्क बने. मेहनत जारी रखी और 2023 में SBI की इंटरनल परीक्षा पास कर असिस्टेंट मैनेजर बन गए. वे JAWS स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर की मदद से कंप्यूटर पर काम करते हैं.
आज संदीप न सिर्फ अपने परिवार का सहारा हैं, बल्कि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा भी बन चुके हैं. उनकी कहानी साबित करती है कि हौसला मजबूत हो तो कोई भी अंधेरा रास्ता नहीं रोक सकता।


