मोक्ष की धरती के रूप में प्रसिद्ध गयाजी आज भी अपनी नई पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। बिहार सरकार ने साल 2025 में ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए ‘गया’ शहर का नाम बदलकर ‘गयाजी’ कर दिया था, लेकिन एक साल बाद भी जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है। शहर के अधिकांश सरकारी कार्यालयों, निजी संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों पर आज भी ‘गया’ नाम ही प्रमुखता से दिखाई देता है।
गयाजी की धार्मिक महत्ता सदियों पुरानी है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु यहां अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं और मोक्ष की कामना करते हैं। इसी आस्था और परंपरा को ध्यान में रखते हुए नाम परिवर्तन किया गया था। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह बदलाव अब तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है।
स्थिति यह है कि कलेक्ट्रेट, एसडीओ कार्यालय, मगध प्रमंडल कार्यालय, एसपी कार्यालय जैसे प्रमुख सरकारी भवनों पर पुराने बोर्ड ही लगे हैं। वहीं, अस्पतालों, बैंकों, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर भी ‘गयाजी’ का नाम नजर नहीं आता। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि सरकारी आदेश अब भी फाइलों तक ही सीमित है।
इस मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ता लालजी प्रसाद ने नाराजगी जताते हुए कहा कि नगर निगम को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। समय सीमा तय कर सभी संस्थानों को नाम बदलने का निर्देश देना चाहिए, अन्यथा कार्रवाई होनी चाहिए।
पंडा समाज भी इस लापरवाही से आहत है। उनका कहना है कि ‘गयाजी’ सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि आस्था और सम्मान का प्रतीक है। वहीं आम जनता ने अपने स्तर पर इस बदलाव को अपनाना शुरू कर दिया है और बातचीत में ‘गयाजी’ का प्रयोग बढ़ रहा है।
हालांकि, दस्तावेजों में बदलाव अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। आधार, पैन, वोटर कार्ड जैसे जरूरी कागजात में ‘गया’ ही दर्ज है, जिससे लोगों को असमंजस का सामना करना पड़ रहा है।
नगर निगम का दावा है कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और जल्द ही सभी बोर्ड व साइनबोर्ड अपडेट किए जाएंगे। अब देखना होगा कि ‘गयाजी’ को उसकी नई पहचान कब पूरी तरह मिल पाती है।
