बिहार के समस्तीपुर जिले में नीलगाय का बढ़ता प्रकोप किसानों के लिए गंभीर संकट बन गया है. हालात ऐसे हो गए हैं कि छोटे और सीमांत किसान खेती छोड़ने तक पर मजबूर हो रहे हैं. कर्ज लेकर बोई गई फसलें रातोंरात नीलगायों के झुंड द्वारा चर ली जाती हैं या रौंद दी जाती हैं, जिससे किसानों की महीनों की मेहनत पल भर में बर्बाद हो जाती है.
कुछ साल पहले तक किसान नीलगाय के नुकसान की बातें सिर्फ सुनते थे, लेकिन अब यह समस्या जिले के हर ब्लॉक में फैल चुकी है. गांव से लेकर शहर के आसपास तक नीलगायों के झुंड खुलेआम घूमते नजर आ रहे हैं. तैयार फसल पर उनका हमला इतना तेज होता है कि किसान कुछ कर भी नहीं पाते.
किसानों ने अपनी तरफ से कई उपाय किए—खेतों में बाड़ लगाई, रोशनी और आवाज के जरिए जानवरों को भगाने की कोशिश की—लेकिन ये सभी प्रयास नाकाम साबित हुए. लगूनिया गांव के किसान विनोद कुमार बताते हैं कि बटाई पर जमीन लेकर खेती करते हैं, लेकिन फसल तैयार होने से पहले ही नीलगाय सब कुछ खत्म कर देते हैं. उनके अनुसार अब खेती करना जोखिम भरा और घाटे का सौदा बन गया है.
वहीं बुजुर्ग किसान नंदकिशोर सिंह का कहना है कि कई बार अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं मिला. कर्ज बढ़ता जा रहा है और खेती का हौसला टूटता जा रहा है. नीलगाय के डर से किसान अब खेत खाली छोड़ने लगे हैं.
इस मामले में वन विभाग का कहना है कि कानून के तहत गैर-वन क्षेत्रों में नीलगाय के आखेट की अनुमति है. किसान मुखिया या रेंज अधिकारी के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं. विभाग ने शूटर तैनात किए हैं और इस साल अब तक 39 नीलगायों का शिकार किया जा चुका है.
इसके बावजूद किसानों में निराशा और आक्रोश बना हुआ है. उनका मानना है कि मौजूदा कार्रवाई पर्याप्त नहीं है. यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो जिले की कृषि व्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ सकता है.
