बिहार के शेखपुरा जिले से एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जो यह साबित करती है कि हौसले के आगे कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। जिला मुख्यालय से करीब 4 किलोमीटर दूर उर्दू प्राथमिक विद्यालय चड़िहारी में तैनात नेत्रहीन शिक्षक रामाशीष कुमार पिछले दो दशकों से बच्चों के जीवन में ज्ञान का उजाला भर रहे हैं।

बचपन में ही आंखों की रोशनी खो देने के बावजूद रामाशीष ने कभी हार नहीं मानी। रोजाना छड़ी के सहारे 4 किलोमीटर पैदल चलकर समय पर स्कूल पहुंचना उनके जज्बे को दर्शाता है। उनकी यह दिनचर्या न सिर्फ अनुशासन का उदाहरण है, बल्कि बच्चों के लिए एक जीवंत प्रेरणा भी है।

रामाशीष कुमार की पढ़ाने की शैली बेहद खास है। वे ब्रेल लिपि की किताबों के माध्यम से पढ़ते हैं और बच्चों को बोलकर समझाते हैं। छात्र उनके निर्देश पर ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं, जिससे पूरी कक्षा सक्रिय रूप से पढ़ाई में भाग लेती है। खास बात यह है कि जरूरत पड़ने पर वे खुद भी ब्लैकबोर्ड पर लिखने की कोशिश करते हैं।

उनकी शिक्षा-दीक्षा भी संघर्षों से भरी रही है। पटना के राजकीय दृष्टि निशक्त विद्यालय से दसवीं, वाराणसी से बारहवीं और दिल्ली के सत्यवती कॉलेज से स्नातक करने के बाद उन्होंने 2006 में शिक्षक के रूप में सेवा शुरू की। तब से लेकर आज तक वे लगातार शिक्षा का अलख जगा रहे हैं।

रामाशीष बताते हैं कि बचपन में गंदे पानी में नहाने के बाद उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी और सही इलाज न मिलने से वे नेत्रहीन हो गए। हालांकि, उन्होंने इस कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया।

वे सरकार से यह मांग भी करते हैं कि हर जिले में दृष्टिबाधित बच्चों के लिए विशेष विद्यालय खोले जाएं, ताकि ऐसे बच्चों का भविष्य बेहतर बन सके।

आज रामाशीष कुमार न सिर्फ एक शिक्षक हैं, बल्कि हजारों बच्चों के लिए उम्मीद और प्रेरणा की मिसाल बन चुके हैं।

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