बिहार के गया जिले के शेरघाटी प्रखंड स्थित चिलम गांव अपनी अनोखी परंपरा के कारण पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। करीब 300 घरों और लगभग 2000 की आबादी वाले इस गांव में सदियों से मांस, मछली, अंडा और शराब का सेवन नहीं किया जाता। गांव के अधिकांश लोग पूर्ण रूप से शाकाहारी हैं और कई परिवार आज भी लहसुन-प्याज तक नहीं खाते।
ग्रामीणों के अनुसार, यहां शाकाहार सिर्फ खानपान नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा है। गांव के बुजुर्ग शिव शंकर पासवान बताते हैं कि बाहर किसी शादी या समारोह में जाने पर लोग अपना सत्तू और पानी साथ लेकर जाते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं जिस बर्तन में खाना मिले, उसमें पहले मांसाहारी भोजन न बना हो। उन्होंने कहा कि वे पिछले 60 वर्षों से चावल तक नहीं खाए हैं और केवल रोटी-सत्तू पर जीवन बिताते हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को मुर्गे का पंख भी छू जाए तो उसे स्नान कर शुद्धिकरण करना पड़ता है। गांव में करीब 14 जातियों के लोग रहते हैं, लेकिन सभी समुदायों में शाकाहार की परंपरा समान रूप से निभाई जाती है।
गांव के लोग खुद को धार्मिक और सत्संगी बताते हैं। यहां शिव गुरु, मां गायत्री और जय गुरुदेव से जुड़े अनुयायियों की संख्या अधिक है। ग्रामीणों के मुताबिक, यदि किसी घर में मांसाहार बन जाए तो लोग वहां आना-जाना तक बंद कर देते हैं।
स्थानीय लोगों का दावा है कि चिलम गांव लगभग 500 साल पुराना है और कभी यहां कोल-भील राजा का गढ़ हुआ करता था। गांव में आज भी पुराने अवशेष और प्राचीन मंदिर मौजूद हैं। कृषि यहां का मुख्य पेशा है, हालांकि अब धीरे-धीरे अन्य व्यवसाय भी शुरू हो रहे हैं।
नई पीढ़ी के कुछ युवाओं ने लहसुन-प्याज खाना शुरू किया है, लेकिन गांव की बड़ी आबादी आज भी पुरानी शाकाहारी परंपरा को पूरी निष्ठा से निभा रही है।


