बिहार की राजनीति में लंबे समय से केंद्रीय भूमिका निभाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जन्मदिन हर साल जदयू कार्यकर्ताओं द्वारा ‘विकास दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। हालांकि नीतीश कुमार स्वयं जन्मदिन पर सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन पार्टी की ओर से ब्लड डोनेशन कैंप, सेवा कार्यक्रम और कार्यकर्ताओं द्वारा केक काटने जैसे आयोजन किए जाते हैं।
करीब दो दशकों से बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदलते हुए भी सत्ता संतुलन साधे रखा। जब भी सहयोगियों से मतभेद बढ़े, उन्होंने नया राजनीतिक समीकरण बनाकर सरकार कायम रखने का कौशल दिखाया, जो उनके सियासी अनुभव और रणनीतिक समझ को दर्शाता है।
अपने कार्यकाल में उन्होंने कई बड़े फैसले लिए, जिनकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई। पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण, छात्राओं के लिए साइकिल योजना और राज्य में पूर्ण शराबबंदी जैसे निर्णयों ने सामाजिक बदलाव की नई दिशा दी। इन पहलों के कारण उन्हें ‘विकास पुरुष’ और ‘सुशासन बाबू’ जैसे विशेषण भी मिले।
जदयू के वरिष्ठ नेता वशिष्ठ नारायण सिंह का कहना है कि उन्होंने छात्र जीवन से ही नीतीश कुमार की कार्यशैली और आंदोलनकारी सक्रियता को करीब से देखा है। उनके अनुसार, “कभी बीमारू कहे जाने वाले बिहार में सड़कों, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जो उनकी योजनाबद्ध कार्यशैली का परिणाम है।”
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही है कि नीतीश कुमार अपने बड़े फैसलों पर वशिष्ठ नारायण सिंह से सलाह-मशविरा करते रहे हैं। दोनों का संबंध 1974 के छात्र आंदोलन के दौर से माना जाता है, जब पटना इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई के दौरान नीतीश कुमार छात्र राजनीति में सक्रिय थे।
नीतीश कुमार की तुलना अक्सर लालू प्रसाद यादव से भी की जाती है, जिनके साथ वे कभी एक ही राजनीतिक धारा में रहे। वशिष्ठ नारायण सिंह के मुताबिक, दोनों नेताओं की लोकप्रियता अपनी जगह है, लेकिन नीतीश कुमार का विजन योजनाबद्ध विकास और प्रशासनिक सुधार पर केंद्रित रहा है, जबकि लालू यादव की शैली अलग रही।
महिला सशक्तिकरण को लेकर भी उनके फैसलों को मील का पत्थर माना जाता है। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने से ग्रामीण राजनीति में व्यापक भागीदारी बढ़ी और सामाजिक बदलाव की नई तस्वीर उभरी। साथ ही उन्होंने परिवारवाद से दूरी बनाकर राजनीति में एक अलग उदाहरण पेश किया, जबकि उनके समकालीन नेताओं के परिवार सक्रिय राजनीति में दिखते रहे।
नीतीश कुमार के निजी जीवन को लेकर भी अक्सर चर्चा होती है कि वे अपने परिवार को राजनीति से दूर रखते हैं। उनके पुत्र निशांत के राजनीति में आने को लेकर अटकलें लगती रहती हैं, लेकिन पार्टी नेताओं का कहना है कि अभी इस पर कोई आधिकारिक निर्णय नहीं है।
राजनीतिक उतार-चढ़ाव, गठबंधन बदलाव और बड़े सामाजिक फैसलों के बीच नीतीश कुमार का 20 साल का कार्यकाल बिहार की राजनीति में एक अलग अध्याय के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि आज भी बिहार की राजनीति में उनकी लोकप्रियता और प्रभाव कायम माना जाता है।
