सरकारी अस्पतालों में दवा का संकट या बड़ा खेल? सहरसा के अस्पतालों में मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की मजबूरी, स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

बिहार सरकार लगातार सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मुफ्त दवा उपलब्ध कराने और डॉक्टरों को बाहर की दवा नहीं लिखने के निर्देश दे रही है। इसके बावजूद सहरसा जिले के नवहट्टा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और सदर अस्पताल से सामने आ रही शिकायतें स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। मरीजों का आरोप है कि सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के बाद भी उन्हें जरूरी दवाएं अस्पताल से नहीं मिल रही हैं और निजी मेडिकल दुकानों से दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

 

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नवहट्टा सीएचसी पहुंचे मरीज सुभाष भगत का आरोप है कि डॉक्टर से जांच कराने के बाद जब वह दवा काउंटर पर पहुंचे तो कई दवाएं उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई। इसके बाद उन्हें अस्पताल के बाहर स्थित एक निजी मेडिकल दुकान से दवा खरीदने की सलाह दी गई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिस मेडिकल दुकान का नाम बताया जाता है, उसका संबंध अस्पताल के एक कर्मी से है। यह भी दावा किया गया कि उक्त दुकान पर पहले भी कार्रवाई हो चुकी है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

 

मरीजों का यह भी कहना है कि डॉक्टरों द्वारा ऐसी दवाएं लिखी जाती हैं जो अस्पताल के स्टॉक में उपलब्ध नहीं रहतीं। दूसरी ओर, सहरसा सदर अस्पताल की ओपीडी में भी मरीजों का आरोप है कि डॉक्टर कई दवाएं लिखते हैं, लेकिन दवा काउंटर पर एक भी दवा उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में गरीब और जरूरतमंद मरीजों को निजी मेडिकल दुकानों से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।

 

यदि सरकारी अस्पतालों में दवा उपलब्ध है तो मरीजों को बाहर क्यों भेजा जा रहा है? और यदि दवा उपलब्ध नहीं है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? यह सवाल अब स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रशासन के सामने खड़े हैं।

 

फिलहाल अस्पताल प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आरोपों की निष्पक्ष जांच और प्रशासन का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। हालांकि लगातार मिल रही ऐसी शिकायतें स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर रही हैं।

 

संवाददाता: इन्द्रदेव जी, सहरसा

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