बिहार के गयाजी जिले के डीहा पंचायत अंतर्गत एक गांव है—**महमदपुर**, जो कभी लोगों की चहल-पहल और धार्मिक आस्था का केंद्र हुआ करता था। यह गांव आज पूरी तरह वीरान है और ‘**बेचिरागी**’ गांव की संज्ञा पा चुका है, जिसका अर्थ है ऐसा स्थान जहां अब कोई दीया जलाने वाला भी नहीं बचा।
महमदपुर गांव की पहचान कभी महादेव स्थान, प्राचीन देवी मंदिर और गौरैया स्थान जैसे धार्मिक स्थलों से हुआ करती थी। आज भी ये स्थान इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां आबादी थी, लोग थे, संस्कृति और परंपरा थी।
### कैसे हुआ गांव खाली?
महमदपुर के खाली होने की कहानी कई दशक पुरानी है। यहां के स्थानीय लोगों के अनुसार, एक बड़ी **आपदा** ने इस गांव को जकड़ लिया था। तब से लेकर आज तक लोगों के दिलों में उस आपदा का खौफ ऐसा समाया कि एक-एक कर सभी ने गांव छोड़ दिया। गांव में किसी एक दिन या एक घटना ने सब कुछ नहीं बदला, लेकिन एक निरंतर भय और असहायता की भावना ने पलायन को मजबूर कर दिया।
आज महमदपुर में कोई निवास नहीं करता। लेकिन यहां एक स्कूल आज भी मौजूद है, जहां पास के गांवों के बच्चे पढ़ाई करने आते हैं।
### महमदपुर में रहते थे कई जातियों के लोग
गांव के पुराने निवासियों में ततवा, राजपूत समेत कई जातियों के लोग शामिल थे। गांव के बुजुर्गों की कहानियों में आज भी महमदपुर की खुशहाली बसती है। एक स्थानीय निवासी बताते हैं, “आपदा ने ऐसा डर पैदा किया कि लोग यहां दोबारा लौटने की हिम्मत नहीं कर सके। मेरे बुजुर्गों ने बताया कि सब कुछ छोड़कर लोगों ने गांव खाली कर दिया।”
### आज कहां हैं महमदपुर के लोग?
डीहा गांव निवासी **अरुण कुमार** बताते हैं कि महमदपुर के लोग अब गयाजी, औरंगाबाद और डीहा पंचायत के अन्य इलाकों में जाकर बस गए हैं। हालांकि, सभी लोगों की जानकारी नहीं है, लेकिन कुछ के वंशज आज भी आसपास की जमीनों पर खेती करते हैं।
### खेती होती है, लेकिन घर नहीं
महमदपुर की जमीन आज भी उपजाऊ है। यह गांव एक **रेवेन्यू विलेज** के रूप में दर्ज है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यहां **कोई घर मौजूद नहीं है**। अगल-बगल के गांवों के लोग यहां खेती करते हैं, लेकिन कोई यहां रात बिताने नहीं आता।
### फिर भी आती है धार्मिक आस्था की लौ
महमदपुर गांव से जुड़े कई पूर्वजों की स्मृतियां आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं। **औरंगाबाद के पूर्व विधायक रामाधार सिंह** और **फतुहा के विधायक** के पूर्वज भी यहीं के थे। आज भी उनके वंशज समय-समय पर यहां पूजा-पाठ कराने आते हैं। वे वही पंडित बुलाते हैं, जिनसे उनके पूर्वज पूजा करवाते थे।
### गुमनाम हो गया गांव
डीहा पंचायत की मुखिया प्रतिनिधि **मिंटू मरांडी** बताती हैं कि आज अधिकांश लोग यह तक नहीं जानते कि डीहा पंचायत में महमदपुर नाम का भी कोई गांव है। उन्होंने सरकार से अपील की है कि इस गांव को फिर से बसाया जाए। मिंटू मरांडी खुद भी महमदपुर की ज़मीन पर खेती करते हैं, और उनकी खेती की रसीद महमदपुर गांव के नाम से कटती है।
### क्या दोबारा बस पाएगा महमदपुर?
महमदपुर आज एक **प्रेतवत वीरान गांव** बन चुका है। सरकारी रिकॉर्ड में आज भी यह गांव जिंदा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यहां अब सिर्फ खामोशी और चील-कौवों की आवाज़ सुनाई देती है।
शायद, अगर सरकार और स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई प्रयास हो, तो यह गांव फिर से आबाद हो सकता है। लेकिन तब तक, महमदपुर बेचिरागी ही कहलाएगा—एक ऐसा गांव, जहां अब कोई चिराग नहीं जलता।
