नालंदा के बिहारशरीफ स्थित करीब 250 साल पुराना ऐतिहासिक नवरत्न महल आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। कभी यही इमारत हाफ टाइम वीविंग स्कूल के रूप में मशहूर थी, जहां से पद्मश्री सम्मानित बुनकर कपिलदेव प्रसाद ने बावन बूटी कला की बारीकियां सीखीं और इस पारंपरिक कला को देश-दुनिया में पहचान दिलाई। विडंबना यह है कि GI टैग मिलने के बाद भी इस कला की जन्मभूमि आज खंडहर में तब्दील हो चुकी है।
18वीं शताब्दी में बना यह महल अपनी अनोखी स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध था। चार स्तंभों पर टिका यह भवन गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म रहता था। ब्रिटिश शासन के दौरान इसे सर्किट हाउस के रूप में इस्तेमाल किया गया, जबकि आजादी के बाद यहां बुनकरों के लिए हाफ टाइम वीविंग स्कूल शुरू हुआ। यहां बच्चों को सामान्य शिक्षा के साथ धागा कातने, ताना-बाना तैयार करने और बावन बूटी बुनाई का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता था।
समय और प्रशासनिक उपेक्षा ने इस ऐतिहासिक धरोहर को खंडहर बना दिया है। भवन की दीवारें और छतें ढह चुकी हैं, चारों ओर झाड़ियां उग आई हैं और यह स्थान असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है। शहर के बीचों-बीच स्थित इस बेशकीमती जमीन पर भू-माफियाओं की नजर भी बनी हुई है।
पद्मश्री कपिलदेव प्रसाद की बहू नीलू कुमारी बताती हैं कि उनके ससुर ने इसी स्कूल से शिक्षा और बुनाई का प्रशिक्षण लिया था। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने 500 रुपये के कर्ज से बुनकर सहयोग समिति बनाई, जो आगे चलकर हजारों बुनकरों की पहचान बनी और इसी सफर ने उन्हें पद्मश्री तक पहुंचाया।
वरिष्ठ पत्रकार सुजीत कुमार वर्मा के अनुसार वर्ष 2016 में सड़क निर्माण के नाम पर नवरत्न महल को तोड़ने की कोशिश हुई थी, जिसे मीडिया के हस्तक्षेप से रोका गया। हालांकि संरक्षण और सौंदर्यीकरण के वादे आज तक पूरे नहीं हुए।
अब बुनकर सहयोग समिति और स्थानीय लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि नवरत्न महल का जीर्णोद्धार कर यहां फिर से हाफ टाइम वीविंग स्कूल शुरू किया जाए, ताकि नई पीढ़ी बावन बूटी कला सीख सके, इस विरासत का संरक्षण हो और स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिल सकें।






