बिहार में शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशकों की मांग अधूरी, पूर्णकालिक करने की लड़ाई जारी

बिहार के सरकारी विद्यालयों में बच्चों को शारीरिक शिक्षा और खेल प्रशिक्षण देने वाले शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशक पिछले चार वर्षों से अपने अधिकार और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। जून 2022 में राज्य के उत्क्रमित मध्य विद्यालयों में इनकी नियुक्ति हुई थी। शुरुआत में इनका मासिक मानदेय महज 8 हजार रुपये निर्धारित किया गया था, जबकि प्रत्येक वर्ष केवल 200 रुपये की वार्षिक वृद्धि का प्रावधान था। हालांकि, अगस्त 2025 से इनके मानदेय को बढ़ाकर 16 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया गया और वार्षिक वृद्धि की राशि भी 400 रुपये कर दी गई। इसके बावजूद इनकी सबसे प्रमुख मांग यानी पूर्णकालिक किए जाने का मामला अब तक अधूरा है।

 

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### 2022 में हुई नियुक्ति, 8 हजार था मानदेय

 

नियुक्ति के शुरुआती दौर में इन अनुदेशकों से विद्यालयों में नियमित शारीरिक शिक्षकों की तरह पूरे दिन काम लिया जाता था। वे बच्चों को पीटी कराने के साथ-साथ खेल गतिविधियों और अन्य शारीरिक शिक्षा संबंधी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते थे। लेकिन जब कम मानदेय में पूरे दिन काम कराने का सवाल उठा तो बिहार के कई जिलों में जिला शिक्षा पदाधिकारियों की ओर से निर्देश जारी किए गए। इसमें विद्यालय के प्रधानाध्यापकों को अनुदेशकों से निर्धारित समय तक ही काम लेने और उन्हें पूरे दिन विद्यालय में रहने के लिए बाध्य नहीं करने की बात कही गई।

 

### पूर्णकालिक कार्य की मांग को लेकर शुरू हुआ संघर्ष

 

इसके बाद अनुदेशकों ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन शुरू किया। स्थानीय विधायक, विधान पार्षद, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री तक आवेदन के माध्यम से अपनी बात पहुंचाई गई। शिक्षा विभाग के वरीय अधिकारियों को भी कई बार पत्र लिखकर मांग की गई कि उन्हें पूर्णकालिक किया जाए, ताकि वे अन्य शारीरिक शिक्षकों की तरह विद्यालय में नियमित रूप से अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें।

 

### सदन में भी उठा अनुदेशकों का मामला

 

इस मुद्दे को विधान परिषद में भी उठाया गया था। उस समय तत्कालीन शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी ने जवाब देते हुए कहा था कि अनुदेशकों की बहाली विद्यालयों में बच्चों को व्यायाम कराने के लिए की गई है। उनका काम प्रार्थना के बाद पीटी कराना है, इसके बाद वे स्वतंत्र हैं। यदि वे चाहें तो पूरा समय विद्यालय में दे सकते हैं।

 

मंत्री के इस जवाब के बाद अनुदेशकों के बीच असमंजस और बढ़ गया। उनका सवाल है कि जब उनकी नियुक्ति शारीरिक शिक्षा के लिए हुई है तो फिर उन्हें नियमित रूप से बच्चों के खेल और शारीरिक विकास से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाने का अवसर क्यों नहीं दिया जा रहा है?

 

### चुनाव और जनगणना में भी ली जाती है पूरे दिन की ड्यूटी

 

अनुदेशकों का सवाल है कि यदि उनकी जिम्मेदारी केवल सुबह पीटी कराने तक सीमित है तो फिर उन्हें चुनाव ड्यूटी, जनगणना और प्रखंड एवं जिला स्तर पर आयोजित खेल प्रतियोगिताओं के संचालन में पूरे दिन क्यों लगाया जाता है? इन कार्यों में उनसे सुबह से शाम तक जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन जब पूर्णकालिक सेवा की मांग होती है तो उनकी भूमिका सीमित बताई जाती है।

 

### खेल प्रतिभाओं को निखारने में निभाते हैं अहम भूमिका

 

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कई अनुदेशक राष्ट्रीय स्तर के कोच हैं। वे विद्यालयों के बच्चों को खेल प्रशिक्षण देते हैं और उन्हें प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए दूसरे राज्यों तक लेकर जाते हैं।

 

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि अनुदेशकों की जिम्मेदारी केवल सुबह पीटी कराने तक सीमित कर दी जाएगी तो बच्चों की खेल प्रतिभा को निखारने का काम कौन करेगा? ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?

 

सरकारी विद्यालयों में खेल शिक्षा का उद्देश्य केवल सुबह व्यायाम कराना नहीं, बल्कि बच्चों में खेल भावना विकसित करना, अनुशासन सिखाना और उनकी प्रतिभा को उचित प्रशिक्षण के माध्यम से आगे बढ़ाना भी है। इसके लिए प्रशिक्षित अनुदेशकों की नियमित भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

 

### गर्दनीबाग में कई बार हुआ आंदोलन

 

अपनी मांगों को लेकर अनुदेशकों ने पटना के गर्दनीबाग में कई बार धरना-प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्हें पुलिस की सख्ती और लाठियों का भी सामना करना पड़ा। बावजूद इसके उन्होंने अपनी मांगों को पीछे नहीं हटाया। वे लगातार जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों तथा मीडिया के माध्यम से सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाते रहे।

 

### 16 हजार हुआ मानदेय, लेकिन मुख्य मांग अब भी अधूरी

 

लगातार संघर्ष के बाद अगस्त 2025 में इनके मानदेय में बढ़ोतरी की गई। 8 हजार रुपये से बढ़ाकर 16 हजार रुपये मासिक मानदेय किया गया और वार्षिक वृद्धि भी 200 रुपये से बढ़ाकर 400 रुपये कर दी गई।

 

मानदेय में बढ़ोतरी को अनुदेशक अपने संघर्ष की एक उपलब्धि मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि यह उनकी मुख्य मांग का समाधान नहीं है। वे चाहते हैं कि उन्हें विद्यालयों में पूर्णकालिक किया जाए और अन्य शारीरिक शिक्षकों की तरह सम्मान एवं सेवा संबंधी सुविधाएं मिलें।

 

### शिक्षा मंत्री के आश्वासन से जगी नई उम्मीद

 

इधर, वर्तमान शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के सम्मान में पटना के आईएमए हॉल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान भी अनुदेशकों का मुद्दा उठा था। शिक्षा मंत्री ने मीडिया के सामने इस मामले पर 100 दिनों का समय मांगा था। हालांकि, अनुदेशकों के अनुसार यह समय काफी पहले पूरा हो चुका है, लेकिन अब तक कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

 

हाल के दिनों में भागलपुर जिले के शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशक संघ के जिलाध्यक्ष अभय मिश्रा और उनके साथियों ने शिक्षा मंत्री सहित कई अन्य मंत्रियों से मुलाकात कर अपनी मांगों को दोहराया है। अभय मिश्रा पूरे बिहार में इस मुद्दे को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

 

उन्होंने अपना बिहार झारखंड की टीम को बताया कि उन्हें सरकार से पूरी उम्मीद है कि उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा। अभय मिश्रा के मुताबिक, भागलपुर में शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने भरे मंच से आश्वासन दिया है कि उन्होंने अनुदेशकों के मामले को संज्ञान में लिया है। इस संबंध में एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) तैयार किया जा रहा है और जल्द ही इस पर काम किया जाएगा।

 

इस आश्वासन के बाद अनुदेशकों में उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन वे अब ठोस निर्णय का इंतजार कर रहे हैं।

 

### मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तक भी पहुंचाई गई आवाज

 

शिक्षा मंत्री के अलावा अनुदेशकों ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से भी अपनी मांगों को लेकर संपर्क किया है। भागलपुर और मुंगेर के अनुदेशकों ने मुख्यमंत्री से तीन से चार बार मुलाकात कर उन्हें सम्मानित करने के साथ-साथ अपनी समस्याओं और मांगों से संबंधित आवेदन भी सौंपा है।

 

अनुदेशकों के अनुसार मुख्यमंत्री ने भी इस मामले को देखने और आवश्यक पहल करने का आश्वासन दिया है। अब उनकी नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।

 

### सबसे बड़ा सवाल, बच्चों की खेल प्रतिभा को कौन निखारेगा?

 

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी विद्यालयों में खेल शिक्षा के भविष्य से जुड़ा है। यदि शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशकों की भूमिका केवल सुबह पीटी कराने तक सीमित रहती है, तो बच्चों को नियमित खेल प्रशिक्षण कौन देगा? विद्यालयों में खेल गतिविधियों का संचालन कौन करेगा? ग्रामीण इलाकों में छिपी प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?

 

आज खेल के क्षेत्र में भारत को आगे बढ़ाने की बात होती है। सरकारें खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने और खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं देने की योजनाएं बनाती हैं। ऐसे में सरकारी विद्यालयों में कार्यरत प्रशिक्षित अनुदेशकों की क्षमता का पूरा उपयोग होना भी जरूरी है।

 

फिलहाल बिहार के शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशक मानदेय बढ़ोतरी को अपनी आंशिक उपलब्धि मानते हुए पूर्णकालिक किए जाने की मांग पर अड़े हैं। शिक्षा मंत्री द्वारा एसओपी तैयार करने का आश्वासन और मुख्यमंत्री तक पहुंची उनकी बातों ने उम्मीद की नई किरण जरूर दिखाई है। लेकिन अब सवाल यही है कि क्या सरकार इनकी वर्षों पुरानी मांग को धरातल पर उतारेगी या फिर एक बार फिर इन्हें आश्वासनों के सहारे इंतजार करना पड़ेगा?

 

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