एंकर: बिहार के गयाजी में शारदीय नवरात्र के दौरान बंगाली संस्कृति की अनूठी झलक देखने को मिल रही है। शहर की पुलिस लाइन स्थित बंगाली कॉलोनी इन दिनों मिनी बंगाल में तब्दील हो गई है। यहां बांग्लादेश से जुड़ी पुरानी परंपराओं और पश्चिम बंगाल की संस्कृति के अनुसार मां दुर्गा की पूजा की जाती है। खास बात यह है कि यहां प्रतिमा निर्माण के लिए बंगाल से मिट्टी और कारीगर आते हैं। साल 1974 से यहां व्यवस्थित रूप से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है।
वीओ-1: गयाजी की बंगाली कॉलोनी में दुर्गा पूजा की परंपरा देश के बंटवारे से पहले की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है। यहां के लोगों के पूर्वज बांग्लादेश से आकर बसे थे। तभी से बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार मां दुर्गा की आराधना की परंपरा चली आ रही है। वर्ष 1974 से यहां व्यवस्थित तरीके से पूजा का आयोजन हो रहा है। प्रतिमा को पारंपरिक स्वरूप देने के लिए पश्चिम बंगाल से मिट्टी, सजावट की सामग्री और कारीगर बुलाए जाते हैं। शोलापीठ की सजावट, पारंपरिक आभूषण और लाल-सफेद परिधान प्रतिमा की खूबसूरती बढ़ाते हैं।
वीओ-2: यहां की पूजा की एक खास परंपरा वेश्यालय के आंगन की मिट्टी का इस्तेमाल करना भी है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, बंगाल की परंपरा के अनुसार प्रतिमा निर्माण में इस मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। कोलकाता के कुम्हार टोली से कारीगर विभिन्न स्थानों की मिट्टी एकत्र कर यहां लाते हैं। मान्यता है कि मां दुर्गा की एक परम भक्त से जुड़ी परंपरा के कारण इस मिट्टी का विशेष महत्व है।
वीओ-3: पूजा के दौरान बंगाली संस्कृति की झलक हर तरफ दिखाई देती है। महिलाएं लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनती हैं। लाल रंग शक्ति और ऊर्जा, जबकि सफेद रंग पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। संध्या आरती में धुनुची नृत्य और पारंपरिक ढाक की गूंज माहौल को भक्तिमय बना देती है। यहां हिंदी या अन्य गानों के बजाय मां दुर्गा के मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। तीन दिनों तक श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण भी होता है।
वीओ-4: गयाजी में बंगाली परंपरा के अनुसार दुर्गा पूजा का आयोजन बंगाली कॉलोनी के अलावा दुर्गाबाड़ी मोहल्ले में भी होता है। दोनों जगहों पर बंगाल की संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का संगम देखने को मिलता है। यही वजह है कि इन पूजा पंडालों में मां दुर्गा के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।








